गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 458, कुल 600 में से
संदर्भ में पढ़ें४२० गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ४ क० ५ ॥ वाले और त्रिष्टुप् छन्द वाले स्तोत्रों को बोलते हैं । ( ऐन्द्रं हि त्रैष्टुभं माध्यन्दिनं सवनम् ) क्योंकि इन्द्र देवता वाला और त्रिष्टुप् छन्द वाला माध्यन्दिन सवन है । ( सर्वे समवतीभिः परिदधति, यत् तत् समवतीभिः परिदधति ) वे सब समवती ऋचाओं से [ सम शब्द वाली ऋचाओं से जैसे- समं ज्योतिः सूर्येण .....अथर्व० ८ । १८ । १, इत्यादि मन्त्रों से ] समाप्त करते हैं क्योंकि वहां समवती ऋचाओं से वे समाप्त करते हैं । ( अन्तः वै पर्यासः अन्तः उदर्कः, अन्तेन एव अन्तं परिदधति ) अन्त ही पर्यास [ विराम ] है, अन्त ही उदर्क [ अवसान वा विच्छेद अर्थात् रोक ] है, अन्त के साथ ही अन्त को वे समाप्त करते हैं [ एक एक विषय पर रुक कर दूसरे को आरम्भ करके पूरा करते हैं ] । ( सर्वे मद्वतीभिः यजन्ति, यत् तत् ॰द्वतीभिः यजन्ति ) वे सब मद्वती [ मद शब्द वाली ] ऋचाओं से यज्ञ करते हैं [ याज्या बोलते हैं ], क्योंकि वहाँ मद्वती ऋचाओं से वे यज्ञ करते हैं । ( सर्वे सुतवतीभिः पीतवतीभिः अभिरूपाभिः यजन्ति ) वे सब सुतवती [ सुत शब्द वाली ] ऋचाओं से, पीतवती [ पीत शब्द वाली ] ऋचाओं से और अभिरूप [ विषय के अनुकूल ] ऋचाओं से यज्ञ करते हैं । [ मद्वती, सुतवती और पीतवती ऋचाओं के लिये देखो ऋ० १ । १६ । ८ । और बहुवचन होने से ब्राह्मण में समस्त इन नौ ऋचा वाले सूक्त का ग्रहण अभीष्ट है । अभिरूप शब्द से यह प्रयोजन है कि अभीष्ट देवता की स्तुति में उस देवता के सूचक पद आजावें ] । ( यत् यज्ञे अभिरूपं, तत् समृद्धम् ) जो यज्ञ में विषय के अनुकूल कर्म है, वह समृद्ध [ सफल ] है । ( सर्वे स्विष्टकृत्वा अनु- वषट् कुर्वन्ति ) सब स्विष्टकृत् मन्त्र [ यदस्य कर्मणोत्यरीरिचम् ़ ़ ़गो० उ० ३ । १ ] पढ़कर अनुवषट् [ समाप्ति सूचक पद ] पढ़ते हैं । ( अनुवषट्कारः स्विष्टकृतम् नेत् अन्तरयाम इति ) अनुवषट्कार स्विष्टकृत् मन्त्र को कभी भी बीच [ व्यवधान ] से नहीं करता । ( अन्तरिक्षलोकः माध्यन्दिनं सवनम् ) अन्तरिक्षलोक ही माध्यन्दिन सवन है । ( तस्य पञ्च दिशः, माध्यन्दिनस्य सवनस्य पञ्च उक्थानि ) उस [ लोक ] की पांच दिशायें [ पूर्व, दक्षिण, पश्चिम, उत्तर और एक ऊपर नीचे की दिशा ] हैं माध्य- न्दिन सवन के पांच उक्थ [ समवती, मद्वती, सुतवती, पीतवती और अभिरूपा ऋचाओं वाले स्तोत्र ] हैं । ( स एतैः पंचभिः उक्थैः एताः पंच दिशः आप्नोति, एताः पंच दिशः आप्नोति ) वह [ यजमान ] इन पांच प्रकार वाले स्तोत्रों से इन पांच दिशाओं को पाता है इन पांच दिशाओं को पाता है [ अर्थात् अवश्य पाता है ] ॥ ४ ॥ भावार्थ :-विद्वान् मनुष्य अपनी कर्मकुशलता से सब दिशाओं में सिद्धि पाता है ॥ ४ ॥ विशेष :-इस कण्डिका को मिलाओ गो० उ० ३ । १६ । तथा गो० उ० ४ । १८ और ऐतरेय ब्राह्मण ३ । १२ । और प्रतीक वाले मन्त्रों को गो० उ० ३ । १६ टिप्पणी २ में देखो ॥ कण्डिका ५ ॥ अथ यदौपासनं तृतीयसवन उपास्यन्ते पितॄनेव तेन प्रीणाति । उपांशु पात्नीवतस्याग्नीध्रो यजति, रेतो वै पात्नीवतः, उपांश्विव वै रेतः सिच्यते, तन्ना-