गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 463, कुल 600 में से
संदर्भ में पढ़ेंगोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ४ । क० ८ ४२५ एव प्रतितिष्ठति ) पाङ्क्त [ पङ्क्ति, विस्तार वाले ] पशु हैं, पशुओं में ही वह प्रतिष्ठा पाता है । ( प्रजया पशुभिः प्रतितिष्ठति, यः एवं वेद ) प्रजा से और पशुओं से वह प्रतिष्ठा पाता है, जो ऐसा जानता है ॥ ७ ॥ भावार्थः-मनुष्य आत्मशुद्धि अर्थात् निष्कपट आचरण से कुटुम्बियों और सेना आदि प्रजाओं और गो घोड़े आदि पशुओं को बढ़ाकर संसार में प्रतिष्ठा पावे । [ पाङ्क्त शब्द का अर्थ पङ्क्ति, पाँच वा विस्तार वाला है ] ॥ ७ ॥ विशेषः-प्रतीक वाला मन्त्र अर्थ सहित लिखा जाता है। अन्य सङ्केतित मन्त्र वेद में देखो ॥ १-अभूद् देवः सविता वन्द्यो नु न इदानीमह्न उपवाच्यो नृभिः । वि यो रत्ना भजति मानवेभ्यः श्रेष्ठं नो अत्र द्रविणं यथा दधत्-ऋ० ४।५४।१ ॥ ( देवः ) दिव्य गुण वाला ( सविता ) सविता [सर्वप्रेरक परमात्मा] ( नु ) शीघ्र (अह्नः) दिन के ( इदानीम् ) इस समय ( नः ) हमारा ( वन्द्यः ) वन्दना योग्य और ( नृभिः ) नेता मनुष्यों से ( उपवाच्यः ) सादर कहने योग्य ( अभूत् ) है, ( यः ) जो [ सविता परमात्मा ] ( मानवेभ्यः ) मननशीलों के लिए ( रत्ना ) रत्नों [ रमणीय धनों ] को ( यथा ) जैसे ( वि भजति ) बाँटता है, [ वैसे ही ] वह [ परमात्मा ] ( नः ) हमको ( अत्र ) यहाँ ( श्रेष्ठं द्रविणम् ) श्रेष्ठ धन वा यश ( दधत् ) देवे ॥ कण्डिका ८ ॥ अग्निर्वाव यम इयं यमी। कुसीदं वा एतद्यमस्य यजमान आदत्ते, यदो- षधीभिर्वेदिं स्तृणाति। तां यदनुपोष्य प्रयायात्, यातयेरन्नेनममुष्मिंल्लोके यमे यत् कुसीदमयमित्यमप्रतीतमिति वेदिमुपोषन्तीहैव सन्यमङ्कुसीदं निरवदाय अनृणो भूत्वा स्वर्गं लोकमेति । विश्वलोप विश्वदावस्य त्वा सं जुहोमीत्याह, होताद्वा यजमानस्यापराभवाय यद्दु मिश्रामिव चरन्त्यञ्जलिना सक्तून् प्रदाव्ये जुहुयात्। एष ह वा अग्निवैश्वानरो यत् प्रदा१व्यः, स्वस्यामेवैनं तद्योन्यां सादयति ॥ ८ ॥ कण्डिका ८ ॥ वेदी पर ओषधी स्थापन और सक्तुओं से होम ॥ ( अग्निः वाव यमः इयं यमी ) अग्नि निश्चय करके यम [जोड़िया भाई के समान] और यह [ वेदी ] यमी [ जोड़िया बहिन के समान ] है। ( यजमानः यमस्य एतत् वै कुसीदम् आदत्ते, यत् ओषधीभिः वेदिं स्तृणाति ) यजमान यम [ अग्नि ] का यह व्याज वाला ऋण ही लेता है, जो ओषधियों [ हव्य पदार्थों ] से वेदी को ढकता है। ( यत् ताम् अनुपोष्या प्रयायात्, एनम् अमुष्मिन् यमे लोके यातयेरन्, यत् कुसीदमयम् इति अप्रतीतम् इति वेदिम् उपोषन्ति, इह एव सन्यमन् कुसीदं निरवदाय अनृणः भूत्वा ८-( यमः ) यम परिवेषणे--अच् । एकगर्भजायमानो यमजो भ्राता ( इयम् ) वेदिः ( यमी ) यम-ङीष् । एकगर्भजायमाना यमजा भगिनी ( कुसी- दम् ) कुसेरुम्भोमेदेताः ( उ० ४ । १०६ ) कुस संश्लेपणे--ईदप्रत्ययः। वृद्धिजीविक- १. पू. सं. "प्रदातव्यः" इति पाठः ॥ सम्पा० ॥