भारतकोश
गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished600 पृष्ठ

पृष्ठ 485, कुल 600 में से

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पृष्ठ 485

गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ४ । क० १७ ॥ ४४७ बिना यज्ञ [ यजमान का ] न बढ़ाते हैं और नहीं चलते हैं [ नहीं आप बढ़ते है। देखो क० ३ ] ॥ १७ ॥ भावार्थः-कण्डिका १५ के समान है ॥ १७ ॥ विशेषः १-( मदयती ) के स्थान पर ( मदपती ) और ( अपसस्परि ) के स्थान पर ( अपस्परि ) वेद मन्त्र से शोधा है ॥ विशेषः २-प्रतीक वाले मन्त्र अर्थ सहित लिखे जाते हैं ॥ १-इन्द्राविष्णू मदपती मदानामा सोमं यातं द्रविणो दधाना । सं वामञ्जन्त्वक्तुभिर्मतीनां सं स्तोमासः शस्यमानास उक्थैः-ऋग्० ६ । ६९ । ३ ॥ ( इन्द्राविष्णू ) हे इन्द्र और विष्णु [ वायु और विजुली के समान सभापति और सेनापति ] ( मदानाम् ) आनन्दों के बीच ( मदपती ) आनन्द के पालने वाले और ( द्रविणो ) धनों के भी ( दधाना ) धारण करने वाले तुम दोनों ( सोमम् ) ऐश्वर्य को ( आ यातम् ) प्राप्त होओ । ( मतीनाम् ) मनुष्यों के ( शस्यमानासः ) बोले हुये ( स्तोमासः ) स्तोम [ स्तुति व्यवहार ] ( अक्तुभिः ) तेजों और ( उक्थैः ) वेद स्तोत्रों के साथ ( वाम् ) तुम दोनों को ( सं सम् अञ्जन्तु ) बहुत अच्छे प्रकार प्रकट करें । २-अधा हीन्द्र गिर्वण उप त्वा कामान् महः ससृज्महे । उदेव यन्त उदभिः-अथर्व० २० । १०० । १, ऋ० ८ । ६८ । ७, [ सायण भाष्य ८७ ] साम० उ० १ । १ । तृच २३ ( गिर्वणः ) हे स्तुतियों से सेवनीय ( इन्द्र ) इन्द्र ! [ महाप्रतापी राजन् ] ( अध हि ) अब ही ( त्वा ) तुझे ( महः ) अपनी बड़ी ( कामान् ) कामनाओं को, ( उदा ) जल [ जल की बाढ़ ] के पीछे ( उदभिः ) दूसरे जलों की बाढ़ों के साथ ( यन्तः इव ) चलते हुये पुरुषों के समान हमने ( उप, ) अंदर से ( ससृज्महे ) समर्पण किया है ॥ ३-इयं त इन्द्र गिर्वणो रातिः क्षरति सुन्वतः । मन्दानो अस्य बर्हिषो वि राजसि-ऋ० ८ । १३ । ४ ॥ ( गिर्वणः ) हे स्तुतियों से सेवनीय ( इन्द्र ) इन्द्र ! [ महाप्रतापी राजन् ] ( ते ) तेरे लिये ( सुन्वतः ) तत्त्वरस निचोड़ने वाले पुरुष की ( इयम् ) यह ( रातिः ) दान क्रिया ( क्षरति ) बहती है, ( मन्दानः ) हर्ष करता हुआ तू ( अस्य बर्हिषः ) इस वृद्धि कारक व्यवहार का ( वि ) विशेष करके ( राजसि ) राजा है ॥ ४-ऋतुर्जनित्री तस्या अपस्परि मक्षू जात आविशद्यासु वर्धते । तदाहना अभवत् पिप्युषी पयोऽशोः पीयूषं प्रथमं तदुक्थ्यम्-ऋ० २ । १३ । १ ॥ ( ऋतुः ) ऋतु [ वर्षाकाल ] ( जनित्री ) [ प्रत्येक पदार्थ की ] जननी है, ( तस्याः परि ) उस [ जननी ] से ( जातः ) उत्पन्न होकर वह [ पदार्थ ] ( मक्षू ) शीघ्र ( अपः ) जलों में ( आ अविशत् ) सब प्रकार से प्रवेश करता है, ( यासु ) जिन [ जलों ] में ( वर्धते ) वह बढ़ता है । ( तत् ) इससे वह [ पदार्थ ] ( आहनाः ) पाने योग्य ( अभवत् ) होता है, और ( पयः ) रस की ( पिप्युषी ) बढ़ाने वाली [ वह जननी ऋतु होती है ] । ( तत् )