भारतकोश
गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished600 पृष्ठ

पृष्ठ 495, कुल 600 में से

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पृष्ठ 495

गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ५ । क० ३ ।। ४५७ हैं—दिन पन्द्रह स्तोत्र वाला है, और रात्रि पन्द्रह स्तोत्र वाली नहीं है, कैसे दोनों [ दिन और रात्रि ] पन्द्रह स्तोत्र वाले हैं और किस कारण से वे दोनों एक से भाग वाले होते हैं। [ इस का समाधान ] ( द्वादश स्तोत्राणि अपिशर्वराणि तिसृभिः देवताभिः, रायन्त- रेण सन्धिना अश्विना यः स्तुवते, तेन रात्रिः पञ्चदशस्तोत्रा, तेन उभे पञ्चदश- स्तोत्रे भवतः तेन ते समावद्भाजो भवतः ) तीन देवताओं सहित बारह स्तोत्र वाले अपिशर्वरस्तोत्र हैं [ आगे विशेषः ४ देखो, उन स्तोत्रों में ] रथन्तर साम की ध्वनि वाले सन्धि [ प्रातःकालीन स्तोत्र ] से दोनों अश्विनों [ दिन रात के मेल ] को जो [ ऋत्विज् ] स्तुति करता है, उस से रात पन्द्रह स्तोत्र वाली है, उससे वे दोनों पन्द्रह स्तोत्र वाले होते हैं, और उसी कारण से वे दोनों एक से भाग वाले होते हैं। ( परिमितं स्तुवन्ति, अप- रिमितम् अनुशँसन्ति ) परिमित [ गिने हुये मन्त्र युक्त ] स्तोत्र पढ़ते हैं और अपरिमित [ बेगिनती मन्त्र वाला ] अनुशास्त्र [ स्तोत्र के पीछे पढ़ा गया स्तोत्र ] वे पढ़ते हैं। ( परि- मितं भूतम्, अपरिमितं भव्यम् ) परिमित [ सीमाबद्ध ] भूतकाल है और अपरिमित [ सीमा बिना ] भविष्यकाल है। (अपरिमितानि एव अवरुन्ध्यात् इति अति- शंसन्ति ) अपरिमितों [ सीमा बिना फलों ] को वह प्राप्त करे, इसलिये वे अति शस्त्र [ स्तोत्रों से अधिक शस्त्र ] पढ़ते हैं। ( स्तोमम् अति, अस्य आत्मानम् अति वै प्रजा पशवः ) स्तोत्र से अधिक [ जैसे अनुशस्त्र हैं, वैसे ] इस के आत्मा से अधिक प्रजा [ पुत्र पौत्र आदि ] और पशु [ गो, घोड़ा हाथी आदि ] होते हैं। ( तत् यत् एव अस्य आत्मा- नम् अति, अस्य तत् एव एतेन आप्याययन्ति ) जो वे [ प्रजा और पशु ] इस के आत्मा से अधिक होते हैं, उसके उनको इस व्यवहार से वे बढ़ाते हैं॥ ( अथो द्वयं वै इदं सर्वं स्नेहः च एव तत् तेजः च ) फिर यह सब दो हैं स्नेह और वह तेज ही [ रात्रि का रस और दिन का प्रकाश ]। ( अथ तत् अहोरात्राभ्याम् आप्तम्, स्नेहतेजसोः आप्त्यै ) फिर जो कुछ दिन और रात्रि से पाने योग्य है, वह (वा० पा० ७ । १ । ३६) पवमानवत्यौ१ (सन्धिना) प्रातःसन्धिना (रायन्तरेण) रथ- न्तरसामध्वनियुक्तेन(अश्विना)अशूङ् व्याप्तौ–क्वन्,इनिः। अश्विनौ यद् व्यश्नुवाते सर्वं रसेनान्यो ज्योतिषान्यः अहोरात्रावित्येके—निरु० १२ । १ । व्याप्तिमन्तौ । अहोरात्रौ । सूर्याचन्द्रमसौ (परिमितम्) परिमितमन्त्रोपेतम् (अनुशंसन्ति) स्तोत्रपश्चात् शस्त्रं पठन्ति (परिमितम्) सीमाबद्धम् (अपरिमितम्) सीमार- हितम् (अवरुन्ध्यात्) प्राप्नुयात् (अतिशंसन्ति) स्तोत्रगतामृक्संख्यामतिलङ्घ्य होतारः शस्त्रं पठन्ति (स्तोमम्) स्तोत्रम् (अति) अतीत्य । उल्लङ्घ्य (प्रजा) पुत्रपौत्रादिरूपा (अस्य) यजमानस्य (स्नेहः) रसः। आर्द्रम् (आप्तम्) प्राप्त- १—यह सिद्धि ठीक नहीं है। यह 'पवमानवती' शब्द को नपुंसकलिङ्ग का द्वि- वचन मान कर की गई है, पर वस्तुतः यह शब्द स्त्रीलिङ्ग द्विवचन का है। जैसा कि इसके विशेषण 'उभे' शब्द से प्रकट है। यद्यपि ऐसी स्थिति में पवमानवत्यौ बनना चाहिये। पुन- रपि 'वाच्छन्दसि' के नियम से पूर्वसवर्ण दीर्घ होकर 'पवमानवती' शब्द साधु सिद्ध होता है ॥ सम्पा० ॥