गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 500, कुल 600 में से
संदर्भ में पढ़ें४६२ गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० । ५ क० ४ मन इन प्राणों का अग्रणी [ आगे ले चलने वाला प्रधान ] होता है, मन से ही प्रेरणा किये हुये हम स्तोत्र के साथ स्तुति करें-इस प्रकार प्राणों को ही उससे मन के साथ वह मिलाता है। ( अथ यत् ब्रह्मा स्तुत इति उच्चैः अनुजानाति, मनः वै ब्रह्मा, मन एव तत् प्राणैः सन्दधाति ) फिर जब ब्रह्मा ऊंचे स्वर से अनुमति देता है-तुम स्तुति करो--मन ही ब्रह्मा है, मन को ही उससे प्राणों के साथ मिलाता है । ( अथ यत् प्रस्तोता प्रस्तौति, अपानम् एव तत् प्राणैः सन्दधाति ) फिर जब प्रस्तोता प्रस्तोत्र बोलता है, अपान को ही उससे प्राणों के साथ वह मिलाता है । ( अथ यत् प्रतिहर्त्ता प्रतिहरति, व्यानम् एव तत् अपानैः सन्दधाति ) फिर जब प्रतिहर्त्ता प्रतिहार स्तोत्र बोलता है, व्यान को ही उससे अपानों के साथ वह मिलाता है । ( अथ यत् उद्गाता उद्गायति, समानम् एव तत् प्राणैः सन्दधाति ) फिर जब उद्गाता [ उत्तम गाने वाला ] उद्गान [ उत्तम साम गान ] करता है, समान वायु को ही उससे प्राणों के साथ वह मिलाता है । ( अथ यत् होता साम्ना शस्त्रम् उपसन्तनोति, वाक् वै होता, वाचम् एव तत् प्राणैः सन्दधाति ) फिर जब होता साम गान के साथ शस्त्र [ स्तोत्र ] को अच्छे प्रकार फैलाता है, वाक् [ जिह्वा ] ही होता, [ हवन करने वाला ] है, जिह्वा को ही उससे प्राणों के साथ वह मिलाता है। ( अथ यत् सदस्यः ब्रह्माणम् उपासीदति, प्रजापतिः वै सदस्यः, प्रजापतिम् एव आप्नोति ) फिर जब सदस्य ब्रह्मा [ मन ] के पास बैठता है, प्रजापति [ प्रजापालक ] ही सदस्य है, प्रजापति [ प्रजापालक व्यवहार ] को ही वह पाता है । ( अथ यत् होत्राशंसिनः सामसन्ततिं कुर्वन्ति, अङ्गानि वै होत्राशंसिनः, अस्य अङ्गानि एव तत् प्राणैः सन्दधाति ) फिर जब होत्राशंसी लोग साम गान का फैलाव करते हैं, अङ्ग ही होत्राशंसी लोग हैं, इस [ यजमान ] के अङ्गों को उससे प्राणों के साथ वह मिलाता है। ( अथ यत् यजमानः स्तोत्रम् उपासीदति आत्मा वै यजमानः, अस्य आत्मानम् एव तत् कल्पयति ) फिर जब यजमान स्तोत्र को समीप से सेवता है, आत्मा ही यजमान है, इस [ यजमान ] के ही आत्मा को उससे वह [ ऋत्विज् ] समर्थ करता है । ( तस्मात् एनं बहिर्वेदि न अभ्याश्रावयेयुः ) इसलिये इससे [ आवश्यकता के लिये बाहिर जाने पर यजमान से ] वेदी से बाहिर स्थान में वे [ ऋत्विज् ] न बातचीत करें, ( न अभ्युदियात् न अभ्यस्तमियात् ) न [ उसको दूसरे स्थान में ] सूर्य उदय हो और न अस्त हो [ दिन रात यजमान यज्ञ शाला में रहे ], ( न अधिष्ण्ये प्रतपेत् ) वह [ यजमान ] धिष्ण्य [ यज्ञाग्नि ] से अन्यत्र न तापे, ( प्राणेभ्यः आत्मानम् अन्तः नेत् अगात् ) और प्राणों से [ अलग पदार्थों को ] अपने भीतर न आने दे ॥ ४ ॥ ( प्रसूता . ) प्रेरिताः ( स्तुयाम ) स्तुतिं कुर्याम ( अनुजानाति ) अनुमन्यते (साम- सन्ततिम् ) सामगानविस्तृतिम् ( कल्पयति ) समर्थयति (बहिर्वेदि) अपपरिवहिरञ्चवः पञ्चम्या ( पा० २ । १ । १२ ) समासान्तोऽव्ययीभावः । वेद्याः सकाशाद् बहिर्देशे ( अभ्याश्रावयेयुः ) अभ्याश्रावणम् अभितो वार्तालापं कुर्युः (अभ्युदिय'त्) उदयम् प्राप्नुयात् ( अस्तमियात् ) अस्तं गच्छेत् ( अधिष्ण्ये ) धिष्ण्यनामकाग्निसकाशाद् भिन्नदेशे ( अन्तः , ' मध्ये ( अगात् ) प्राप्नुयात् ॥