भारतकोश
गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished600 पृष्ठ

पृष्ठ 502, कुल 600 में से

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४६४ गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ५ । क० ५ ॥ स्तुवते, मध्यमेषु पदेषु निनर्द॑यन्ति, मध्यमरात्रात् एव तत् असुरान् निघ्नंन्ति ) मध्यम पर्य्यायों में वे स्तोत्र पढ़ते हैं, मध्यम पदों में ऊँचे बोलते हैं, रात्रि के मध्य से ही तब असुरों को निकाल मारते हैं। ( उत्तमेषु पर्य्यायेषु स्तुवते, उत्तमेषु पदेषु निनर्द॑यन्ति, उत्तम- रात्रात् एव तत् असुरान् निघ्नंन्ति ) पिछले पर्य्यायों में वे स्तोत्र पढ़ते हैं, पिछले पदों में ऊँचे बोलते हैं, रात्रि के पिछले भाग से ही तब असुरों को निकाल मारते हैं। ( तत् यथा अभ्याघारात् पुनः पुनः पाप्मानं निर्हरन्ति, एवम् एव एतत्, स्तोत्रियानुरूपाभ्याम् अहोरात्राभ्याम् एव तत् असुरान् निघ्नंन्ति ) सो जैसे बड़े प्रकाश से बार बार पाप को निकाल देते हैं, वैसे ही यह है, स्तोत्रिय और अनुरूप [ विषय के सदृश स्तोत्र ] के द्वारा दिन और रात से ही तब से असुरों को निकाल मारते हैं ॥ ( गायत्रीं शंसन्ति, ब्रह्मवर्चसं तेजः वै गायत्री, ब्रह्मवर्चसं तेजः एव अस्मै तत् यजमाने दधति ) गायत्री [ गायत्री मन्त्र और छन्द ] को वे पढ़ते हैं, ब्रह्मवर्चस तेज [ वेद पढ़ने से पाया हुआ तेज ] ही गायत्री है, ब्रह्मवर्चस तेज को ही इस [ जगत् के ] हित के लिए तब यजमान में वे धारण करते हैं। ( गायत्री [ गायत्रीं ] शस्त्वा जगतीं शंसन्ति, ब्रह्म ह वै जगती, ब्रह्मणा एव अस्मै तत् ब्रह्मवर्चसं यजमाने दधति ) गायत्री बोलकर जगती [ जगती छन्द वा जगत् उपकारिका ऋचा ] वे बोलते हैं, ब्रह्म [ वेद ज्ञान ] ही जगती है, ब्रह्म [वेदज्ञान] से ही इस [ जगत् ] के हित के लिए तब ब्रह्मवर्चस् को यजमान में वे धारण करते हैं। ( गायत्रीः च जगतीः च अन्तरेण व्याह्वयन्ते, छन्दांसि एव तं नानावीर्याणि कुर्वन्ति ) गायत्री छन्दों और जगती छन्दों को अलग अलग वे विविध प्रकार बोलते हैं, छन्द ही उस [ यजमान ] में बहुत से सामर्थ्य करते हैं। ( जगतीः शस्त्वा त्रिष्टुभः शंसन्ति, पशवः वै जगती, पशून् एव तत् त्रिष्टुभः परिदधति ) जगती छन्दों को बोलकर वे त्रिष्टुभों को बोलते हैं, पशु ही जगती [ जगत् उपकारिका शक्ति ] हैं, पशुओं को ही तब त्रिष्टुम् धारण करते हैं। ( बलं वै वीर्य्यं त्रिष्टुप्, बलम् एव तत् वीर्ये अन्ततः प्रतिष्ठापयति ) बल वीर्य ही त्रिष्टुप् [ तीन कर्म, उपासना और ज्ञान का ठहराव ] है, बल को ही तब वीर्य [ धातु पुष्टि ] में अन्त में वह स्थापित करता है। ( अन्धस्वत्यः, मद्वत्यः, सुतवत्यः, पीतवत्यः त्रिष्टुभः याज्याः समृद्धाः सुलक्षणाः, एतत् वै रात्रीरूपं जागृयात् ) अन्धस्वती [ अन्धस्, अन्न शब्द वाली ], मद्वती [ मद अर्थात् हर्ष शब्द वाली ]; सुतवती [ सुत, निचोड़े हुए सोम शब्द वाली ] पीतवती [ पीत, पीये हुये सोम रस शब्द वाली ], त्रिष्टुभ ऋचायें यज्ञ करने योग्य, समृद्ध और सुन्दर लक्षण वाली हैं, इनसे ही रात्रि रूप [ अन्धकार ] में वह जागता रहे। ( रात्रिं यावत् उ ह वै न वा स्तुवते, निःसार्य नाशयन्ति ( अभ्याघारात् ) अभि+आ+घृ क्षरणे दीप्तौ च—घञ् । सर्वतः प्रकाशात् ( निर्हरन्ति ) नाशयन्ति ( ब्रह्मवर्चसम् ) वेदाध्ययनजन्यतेजः ( दधति ) धारयन्ति ( ब्रह्म ) वेदज्ञानम् (व्याह्वयन्ते ) विविधमाह्वयन्ति कथयन्ति ( नानावीर्याणि ) विविधवीरकर्माणि ( वीर्ये ) धातुपुष्टौ ( सुलक्षणाः ) सुलक्षणयुक्ताः ( जागृयात् ) प्रबुध्येत् ( ईश्वरा ) शेलुंक् । ईश्वराणि समर्थानि ( अनुवनयन्ति ) वन हिंसायाम् । निरन्तरं नाशयन्ति ( सम् ) सम्भूय ( उ ) एव ( तस्य ) दृश्यमानस्य सूर्यस्य ( आदारे ) आदारयन्ति शत्रून् यत्र । आ+दृ विदारणे-

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