गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 509, कुल 600 में से
संदर्भ में पढ़ेंगोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ५ । क० ४ ४७१ के लिये चढ़ता है, सम्पूर्ण महत्त्व के लिये चढ़ता है, मनुष्य लोक से [अलग करके शूरवीरों में]ही इस [यजमान] को भीतर धारण करते हैं। (देवस्य सवितुः सवं स्वर्गं लोके वर्षिष्ठं नाकं रोहे- यम् इति ब्रह्मा रथचक्रं सर्पति, सवितृप्रसूतः एव एनं तत् समर्पयति ) प्रकाशमान प्रेरक परमात्मा के ऐश्वर्य युक्त स्वर्ग लोक और सबसे बड़े सुख में मैं चढूँ-[यह ब्राह्मण वचन बोलकर ] ब्रह्मा रथ के पहिये के पास जाता है, सर्वप्रेरक परमात्मा से प्रेरणा किया हुआ ही वह इस [ यजमान ] को उसे [ रथ ] सौंप देता है। (अथो प्रजापतिः वै ब्रह्मा, प्रजापतिम् एव एनम् वज्रात् नाकस्य उज्जित्यै वाजिनां सन्तत्यै अधि प्रसुवति ) फिर प्रजापति [ प्रजापालक ] ही ब्रह्मा [ चतुर्वेदी ऋत्विज् ] है, प्रजापति [ प्रजापालक ] इस [ यजमान ] को ही वज्र से सुख के लाभ के लिये और ज्ञानियों के विस्तार के लिये वह अधिकार पूर्वक प्रेरणा करता है । ( वाजिसाम अभिगायति, वाजिमान् भवति ) ज्ञानियों का साम वह [ ब्रह्मा ] भली भांति गाता है, ज्ञानी पुरुषों वाला वह [ यजमान ] होता है। (वाजः वै स्वर्गः लोकः, तं स्वर्गं लोकम् एव रोहति ) वाज [ ज्ञान ] ही स्वर्गलोक है, उस स्वर्ग लोक को ही वह [ यजमान ] चढ़ता है। ( विष्णोः शिपिविष्टवतीषु बृहत् उत्तमं भवति, तं स्वर्गं लोकम् एव रूढ्वा ब्रध्नस्य विष्टपम् अतिक्रामति अतिक्रामति ) विष्णु देवता [ सर्वव्यापक परमेश्वर ] की शिपिविष्टवती ऋचाओं में [ शिपिविष्ट, प्रकाशयुक्त परमेश्वर शब्द वाली ऋचाओं में जैसे ७-किमित्ते विष्णो परिचक्ष्यं मूत्......ऋग् ७ । १०० । ६ ] बहुत बड़ा सबसे पिछला [ अन्तिम यज्ञ भाग ] होता है, उस स्वर्ग लोक को ही चढ़कर ब्रघ्न [ लोकों को आकर्षण में बांधने वाले सूर्य ] के लोक को वह [ यजमान ] लांघ जाता है, लांघ जाता है ॥ ८ ॥ भावार्थः-मनुष्य को चाहिये कि महाविद्वानों की सम्मति से ज्ञानपूर्वक पराक्रमी होकर संसार में बड़ी से बड़ी प्रतिष्ठा पावे ॥ ८ ॥ विशेषः-सङ्केतित मन्त्र अर्थ सहित लिखे जाते हैं ॥ १:-शुक्रवती ऋचा-वायो शुक्रो अयामि ते मध्वो अग्रं दिविष्टिषु । आ याहि सोमपीतये स्पार्हो देव नियुत्वता-ऋग् ० ४ । ४७ । १ ॥ ( वायो ) हे वायु ! [ वायु के समान वेग वाले वीर ( शुक्रः ) शुक्र [ शुद्ध-स्वभाव वाला वा वीर्यवान् ] मैं ष्ठम् ) वृद्ध-इष्ठन् । वृद्धतमम् ( सर्पति ) प्राप्नोति ( समर्पयति ) ऋ गतौ-णिच् । सम्प्रददाति ( वाजिनम् ) ज्ञानिनाम् ( वाजिसाम ) वाजिनो ज्ञानिनः परमेश्वरस्य मोक्षज्ञानम् ( वाजिमान् ) ज्ञानिपुरुषैर्युक्तः ( विष्णोः ) व्यापकस्य परमेश्वरस्य ( शिपिविष्टवतीषु ) शिपिविष्टशब्दयुक्तासु । सर्वधातुभ्य इन् ( उ० ४ । ११८ ) शितृ निशाने, छेदने-इन् कित् पुक् च, शिपि + विश प्रवेशने-क्तः । शिपिविष्टोऽस्मीति प्रतिपन्नरश्मिः । शिपयोऽत्र रश्मय उच्यन्ते तैराविष्टो भवति-निरु० ५ । ८ । रश्मि- भिर्युक्तः । प्रकाशयुक्तः परमेश्वरः ( ब्रध्नस्य ) बन्धेर्बंधिबुधौ च ( उ० ३ । १५ ) बन्ध बन्धने-नक्, ब्रधादेशः । लोकानां बन्धकस्य आकर्षणे धारकस्य सूर्यस्य ( विष्टपम् ) विटपविष्टपविशिपोलपाः ( उ० ३ । १४५) विश प्रवेशने-कपनप्रत्ययः तुट् च । भुवनम् । लोकम् ( अतिक्रामति ) अतीत्य गच्छति ॥