भारतकोश
गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished600 पृष्ठ

पृष्ठ 530, कुल 600 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 530

४९२ गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ६ । क० १ [ सूक्तों ] में आवाप [ क्षेपक सूक्त ] को वे [ ऋत्विज् ] डालें--[ अर्थात् न्यूङ्ख को छोड़- कर विराट् छन्द छह दिन वाले यज्ञ के ] चौथे दिन में, वैमदी [ विमदी अर्थात् विमद ऋषि की देखी हुई ऋचायें ] पङ्क्ति छन्द वाली पाचवें में, और पारुच्छेपी [ परुच्छेपी अर्थात् परुच्छेद ऋषि की देखी हुई ऋचायें ] छठे में [ इस विषय में विशेषः ४ देखो ] ( अथ यानि अन्यानि महास्तोत्राणि अष्टर्चार्नि, आवपेरन् ) जो दूसरे महास्तोत्र आठ ऋचा वाले हैं, [ उनको ] आवाप [ क्षेपणीय ] बनावें [ कण्डिका २ देखो ] ॥१॥ भावार्थः-यज्ञ में ठीक ठीक मन्त्रों के प्रयोग से ऋत्विज् लोग यजमान को स्वर्ग में पहुँचाते हैं ॥ १ ॥ विशेषः १-इस कण्डिका को ऐतरेय ब्राह्मण ६ । १८ तथा ६ । १६ से मिलाओ । विशेषः २-प्रतीक वाले मन्त्र अर्थ सहित दिये जाते हैं ॥ १-एवा त्वामिन्द्र वज्रिन्नत्र विश्वे देवासः सुहवास ऊमाः। महामुभे रोदसी वृद्धमृष्वं निरेकमिद् वृणते वृत्रहत्ये--ऋ० ४ । १९ । १-११, वामदेव ऋषि ॥ यह मन्त्र आ चुका है-गो० उ० ४ । १ । शेष मन्त्र वेद में देखो । २-यन्न इन्द्रो जुजुषे यच्च वष्टि तन्नो महान् करति शुष्म्या चित् । ब्रह्म स्तोमं मघवा सोममुक्था यो अश्मानं शवसा बिभ्रदेति--ऋग्० ४ । २२ । १- ११, वामदेव ऋषि ॥ ( यत् इन्द्रः ) जो इन्द्र [ बड़े ऐश्वर्य वाला राजा ] : नः ) हमें ( जुजुषे ) सेवता है ( च ) और ( यत् ) जो ( वष्टि ) चाहता है, ( तत् ) वह ( महान् ) महान् [ पूजनीय ], ( शुष्मी ) अति बली ( नः ) हम को ( चित् ) ही ( आ करति ) स्वीकार करे, ( यः ) जो ( मघवा ) महाधनी [ .राजा ] ( ब्रह्म ) बहुत धन वा अन्न, ( स्तोमम् ) प्रशंसनीय गुण, ( सोमम् ) तत्त्वरस, ( उक्था ) प्रशंसनीय वस्तुओं और ( अश्मानम् ) मेघ [ के समान उपकारी गुण ] को ( शवसा ) बल के साथ ( बिभ्रत् ) धारण करता हुआ ( एति ) चलता है ॥ [ शेष मन्त्र वेद में देखो ] ॥ ३-कथा महामवृधद् कस्य होतुर्र्यज्ञं जुषाणो अभि सोममूहः । पिब- न्नुशानो जुषमाणो अन्धो ववक्ष ऋष्वः शुचते धनाय--ऋ० ४ । २३ । १--११, वामदेव ऋषि ॥ ( कथा ) किस प्रकार से ( कस्य होतुः ) किस दानी के ( महाम् ) बड़े ( यज्ञम् ) यज्ञ [ सङ्गति योग्य व्यवहार ] को ( जुषाणः ) सेवन करता हुआ वह [ इन्द्र विद्वान् ] ( ऊधः ) निवाहने वाले ( सोमम् अभि ) सोम [ तत्त्वरस ] के लिये ( अवृधत् ) बढ़ता है। [ उस सोम को ] ( उशानः ) चाहता हुआ ( पिबन् ) पीता हुआ, ओर ( जुषमाणः ) प्रसन्न होता हुआ ( ऋष्वः ) वह महान् पुरुष ( अन्धः ) अन्न ( ववक्ष ) पहुँचाता है, और ( धनाय ) धन के लिये ( शुचते ) सोचता है ॥ [ शेष मन्त्र वेद में देखो ] ॥ प्रक्षिपेयुः ( अन्यूङ्खाः ) न्यूङ्खाख्यामिश्रंङ्ग्भी रहिताः ( वैमदीः ) विमद-अण्, ङीप् । विमदाख्येन महर्षिणा दृष्टाः (पारुच्छेपी:)—ऐ० ब्रा० ६ । १६ । परुच्छेपेण दृष्टाः ॥