भारतकोश
गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished600 पृष्ठ

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४९४ गोपथब्राह्मणं उत्तरभागे प्र० ६ । क० २ न देने वाले के ( गयस्य ) घर का ( वेदः ) धन ( सुष्वितराय ) अधिक ऐश्वर्य वाले व्यवहार के लिए ( प्रयन्ता ) देने वाला ( असि ) है ॥ [ शेष मन्त्र वेद में देखो ] ॥ १०--इमामू षु प्रभृतिं सातये धाः शश्वच्छश्वदूतियोंदिमानः । सुतेसुते वावृधे वर्धनेभिर्यः कर्मभिर्महद्भिः सुश्रुतो भूत्--ऋ० ३ । ३६ । १-६, विश्वामित्र ऋषि ॥ यह मन्त्र आ चुका है—गो० उ० ४ । ३ ॥ शेष मन्त्र वेद में देखो ॥ ११-इच्छन्ति त्वा सोम्यासः सखायः सुन्वन्ति सोमं दधति प्रयांसि । तितिक्षन्ते अभिशस्तिं जनानामिन्द्र त्वदा कश्चन हि प्रकेतः-ऋ० ३ । ३० । १--२२, विश्वामित्र ऋषि ॥ ( सोम्यासः ) तत्त्वरस के योग्य [ ब्रह्मज्ञानी ] ( सखायः ) मित्र लोग ( त्वा ) तुझे ( इच्छन्ति ) चाहते हैं, ( सोमम् ) ऐश्वर्य को ( सुन्वन्ति ) सिद्ध करते हैं, ( प्रयांसि ) तृप्त करने वाले अन्न आदि वस्तुयें ( दधति ) धारण करते हैं और ( जनानाम् ) मनुष्यों की ( अभिशस्तिम् ) सब ओर से हिंसा का ( आ तितिक्षन्ते ) भले प्रकार सहते हैं, ( हि ) क्योंकि, ( इन्द्र ) हे इन्द्र ! [ बड़े ऐश्वर्य वाले वीर ] ( त्वत् ) तुझसे [ अधिक ] ( प्रकेतः ) उत्तम बुद्धिवाला ( कः चन ) कौन सा है ? ॥ शेष मन्त्र वेद में देखो ॥ १२--शासद् वह्निर्दुहितुर्नप्त्यं गाद् विद्वाँ ऋतस्य दीधितिं सपर्यन् । पिता यत्र दुहितुः सेकम्मृञ्जन्त्सं शग्म्येन मनसा दधन्वे-ऋ० ३ । ३१ । १- २०, विश्वामित्र ऋषि ॥ यह मन्त्र आ चुका है। गो० उ० ५ । १५ ॥ शेष मन्त्र वेद में देखो ॥ विशेष: ३-( अन्यूङ्गा विराजः--इत्यादि.) न्यूङ्ग रहित । विराट् छन्द, वैमदी, पङ्क्ति, ओर पारुच्छेपी ऋचायें। ( यज्ञकर्मण्यजपन्यूङ्खसामसु पाणिनि १ । २ । ३४ ) यज्ञ कर्म में जप, न्यूङ्ग और साम गान को छोड़ कर एक श्रुति स्वर हो-यहाँ न्यूङ्ग शब्द आया है। सोलह प्रकार के ओङ्कार सहित वेद मन्त्र न्यूङ्ग कहाते हैं। सायण भाष्य ऐ० ब्रा० ६ । १६ में अन्यूङ्ग आदि इस प्रकार माने हैं- ( न ते गिरो अपि मृष्ये- ऋ० ७ । २२ । ५-८) तथां ( प्र वो महे महिवृधे भरध्वं-ऋ० ७ । ३१ । १०-१२ ) यह सात विराट् ऋचायें हैं जिनका प्रयोग न्यूङ्ग बिना होता है ॥ ( यजामह इन्द्रं-ऋ० १० । २३ । १-७) यह सात ऋचायें वैमदी हैं, अर्थात् इन के विमद ऋषि हैं । ( यच्चिद्धि सत्य सोमपा ऋ० १ । २ । १-७ ) यह सात ऋचायें पङ्क्ति छन्द वाली हैं ॥ ( इन्द्राय हि द्योरसुरो-ऋ० १ । १३१ । १-७) यह सात ऋचायें पारुच्छेपी हैं, इन के परुच्छेप ऋषि हैं ॥ कण्डिका २ ॥ को अद्य नर्यो देवकाम इति मैत्रावरुणः । वने न वा यो न्यधायि चाक- न्निति ब्राह्मणाच्छंसी । आ याह्यर्वाङुप बन्धुरेष्ठा इत्यच्छावाकः । एतानि वा आवपनानि, एतैरेवावपनैर्देवाश्च ऋषयश्च स्वर्गं लोकमायन् । तथैवैतद्यज-