गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 534, कुल 600 में से
संदर्भ में पढ़ें४२६ गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ६ । क० ९ इन ही आवपनों से स्वर्गलोक पाते हैं। ( सद्यो ह जातो वृषभः कनीनः—इति मैत्रा- वरुणः सम्पातानां पुरस्तात् अहरहः शंसति ) सद्यो ह जातः वृषभः कनीनः—ऋ० ३ । ४८ । १—५, गो० उ० ४ । १,—इस सूक्त को मैत्रावरुण सम्पातों से पहिले [कण्डिका १] दिन दिन बोलता है। ( तत् एतत् सूक्तं स्वर्ग्यं एतेन सूक्तेन देवाः च ऋषयः च स्वर्गं लोकम् आयन् ) सो यह सूक्त स्वर्ग के लिए हितकारी है, इस सूक्त से देवों [ विद्वानों ] और ऋषियों [ सन्मार्गदर्शक महात्माओं ] ने स्वर्गलोक पाया है। ( तथा एव एतत् यजमानाः एतेन एव सूक्तेन स्वर्गं लोकं यन्ति ) वैसे ही यह है—यजमान लोग इस ही सूक्त से स्वर्ग लोक पाते हैं। ( तत् ऋषभवत् पशुमत् पशूनाम् आप्त्यै भवति ) वह ऋषभ [ वृषभ ] शब्द वाला पशु युक्त [ सूक्त ] पशुओं की प्राप्ति के लिये हैं [ ऋषभ वा वृषभ बैल भी है और वह पशु है ] । ( तत् पञ्चचं भवति, अन्नं वै पङ्क्तिः अन्नाद्यस्य अवरुद्धयै ) वह पाँच ऋचा वाला [ सूक्त ] है, अन्न भी पङ्क्ति [ पाँच तत्त्व वाला ] है। खाने योग्य अन्न की प्राप्ति के लिए है [ पंचभूतात्मके देहे आहारः पाञ्चभूतिकः । विपक्वः पंचधा सम्यग् गुणान् स्वानभिवर्धयेत्—सुश्रुत-आहारविधिः । पृथिवी जल अग्नि वायु आकाश इन पाँच तत्त्वों से बने देह में आहार पाँच तत्त्वों के स्वरूप का है, अच्छे प्रकार पका हुआ आहार पाँच प्रकार अपने गुणों को बढ़ाता है—जैसे पार्थिव गुण गन्ध को बढ़ाता है, इसी प्रकार और भी जानो ] । ( अरिष्टैः नः पथिभिः पारयन्ता इति स्वर्गतायै एव एतत् अहरहः शंसति ) अरिष्टैनैः पथिभिः पारयन्ता [ सं वां कर्मणा--ऋ० ६ । ६६ । १, इस मन्त्र का यह चौथा पाद है, देखो गो० उ० ४ । १७ ] स्वर्ग की प्राप्ति के लिए ही इसको वह [ मैत्रावरुण ] बोलता है। ( उदु ब्रह्माण्यैरत श्ववस्या इति ब्राह्मणाच्छंसी ) उदु ब्रह्माण्यैरत श्ववस्या—ऋ० ७ । २३ । १—६ । गो० उ० ४ । १ तथा ६ । १, इस सूक्त को ब्राह्मणाच्छंसी [ बोलता है ] । ( ब्रह्मवत् एतत् समृद्धं सूक्तम्, एतेन सूक्तेन देवाः च ऋषयः च स्वर्गं लोकम् आयन् ) ब्रह्मन् [ ब्रह्माणि ] शब्द वाला यह समृद्ध सूक्त है, इस सूक्त से देवों [ विद्वानों ] और ऋषियों [ सन्मार्गदर्शक महात्माओं ] ने स्वर्ग लोक पाया है। ( तथा एव एतत्, यजमानाः एतेन सूक्तेन स्वर्गं लोकं यन्ति ) उसी प्रकार ही यह है—यजमान लोग इस ही सूक्त से स्वर्ग लोक पाते हैं। ( तत् उ वै षडर्चं, ऋतवः, ऋतूनाम् आप्त्यै ) यह सूक्त छह ऋचा वाला है, छह ही ऋतुयें हैं, ऋतुओं की प्राप्ति के लिये [ यह सूक्त है ] । ( तत् सम्पातानाम् उपरिष्टात् अहरहः शंसति ) उसको सम्पात सूक्तों के उपरान्त [ क० १ ] दिन दिन वह पढ़ता है ॥ ( अभि तष्टेव दीधया मनीपाम्—इति अच्छावाकः अहरहः शंसति ) अभि तष्टेव दीधया मनीपाम्—ऋ० ३ । ३८ । १--१० गो० उ० ६ । १, इस सूक्त को अभिमुखः ( उप ) समीपे ( बन्धुरेष्ठाः: ) मद्गुरादयश्च ( उ० १ । ४१ ) बन्ध बन्धने—उरच्, बन्धुर—तिष्ठतेर्विच् । बन्धुरे बन्धनयुक्ते रम्ये वा रथे तिष्ठन् ( आवपनानि ) आवपनेयानि । प्रक्षेपोणीयानि सूक्तानि ( ऋषभवत् ) ऋषभण वृषभशब्देन युक्तम् ( पङ्क्तिः ) पचि व्यक्तीकरणे, विस्तारे—क्तिन् क्तिच् वा । पञ्चावयवा श्रेणिः पञ्चतत्वयुक्तत्वात् ( अरिष्टैः ) गो० उ० ४ । १६ । अर्हिंसितैः ( पारयन्ता ) पारं गमयन्तौ ( अभिवदति ) अभिशब्दयुक्तं सूक्तं ब्रूते ( तत्यै )