गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 549, कुल 600 में से
संदर्भ में पढ़ेंगोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ६ । क० ७ ५११
लोकस्य रूपम्। यद्वेव शिल्पानि, आत्मसंस्कृतिर्वे शिल्पान्यात्मानमेवास्य तत् संस्कुर्वन्ति ॥ ७ ॥ कण्डिका ७ ॥ यज्ञ में उक्थों और शिल्पों का वर्णन ॥ (आग्नेयीषु मैत्रावरुणस्य उक्थं प्रणयन्ति) अग्नि देवता वाली ऋचाओं में मैत्रावरुण ऋत्विज् के उक्थ [स्तोत्र] को आगे लाते हैं। (वीर्यं वै अग्निः, वीर्येण एव अस्मै तत् प्रणयन्ति) वीर्य [पराक्रम] ही अग्नि है, वीर्य के साथ ही इस [यजमान] के लिये उस [उक्थ] को आगे लाते हैं। (ऐन्द्रावारुणम् अनुशस्यते) इन्द्र-वरुण देवता वाला [उक्थ] फिर बोला जाता है। (वीर्यं वै इन्द्रः, क्षत्रं वरुणः, पशवः उक्थानि, तत् वीर्येण एव क्षत्रेण च उभयतः पशून् स्थित्याः अनपक्रान्त्यै परिगृह्णाति) वीर्य ही इन्द्र है, राज्य वरुण है, सब पशु उक्थ हैं, तब वीर्य के साथ और राज्य के साथ ही दोनों ओर से पशुओं को स्थिति [ठहराव] की अचलता [दृढ़ता] के लिये वह [यजमान] ग्रहण करता है। (ऐन्द्रीषु ब्राह्मणाच्छंसिनः उक्थं प्रणयन्ति) इन्द्र देवता वाली ऋचाओं में ब्राह्मणा- च्छंसी के उक्थ को आगे लाते हैं। (वीर्यं वै इन्द्रः, वीर्येण एव अस्मै तत् प्रणयन्ति) वीर्य [पराक्रम] ही इन्द्र है, वीर्य के साथ ही इस [यजमान] के लिये उस [उक्थ] को आगे लाते हैं। (ऐन्द्राबार्हस्पत्यम् अनुशस्यते) इन्द्र-बृहस्पति वाला उक्थ फिर बोला जाता है। (वीर्यं वै इन्द्रः, ब्रह्म बृहस्पतिः, पशवः उक्थानि, तत् वीर्येण एव ब्रह्मणा च उभयतः पशून् स्थित्याः अनपक्रान्त्यै परिगृह्णाति) वीर्य ही इन्द्र है, ब्रह्म [वेदज्ञान] बृहस्पति है, सब पशु उक्थ हैं, तब वीर्य के साथ और ब्रह्म के साथ ही दोनों ओर से पशुओं को स्थिति [ठहराव] की अचलता के लिये वह [यजमान] ग्रहण करता है। (ऐन्द्रीषु अच्छावाकस्य उक्थं प्रणयन्ति) इन्द्र देवता वाली ऋचाओं में अच्छा- वाक के उक्थ को आगे लाते हैं। (वीर्यं वै इन्द्रः, वीर्येण एव अस्मै तत् प्रणयन्ति) वीर्य [पराक्रम] ही इन्द्र है, वीर्य के साथ ही इस [यजमान] के लिये उस [उक्थ] को आगे लाते हैं। (ऐन्द्रावैष्णवम् अनुशस्यते) इन्द्र-विष्णु वाला उक्थ फिर बोला जाता है। (वीर्यं वै इन्द्रः, यज्ञः विष्णुः पशवः उक्थानि, तत् वीर्येण एव च यज्ञेन उभयतः पशून् परिगृह्य क्षत्रे अन्ततः प्रतिष्ठापयति) वीर्य ही इन्द्र है, यज्ञ [देव पूजनादि] विष्णु [व्यापक] है, सब पशु उक्थ हैं, तब वीर्य से साथ और यज्ञ के साथ ही दोनों ओर से पशुओं को ग्रहण करके राज्य पर अन्त में [यजमान को] स्थापित करता है। (तस्मात् उ क्षत्रियः भूयिष्ठं हि पशूनाम् ईशते यः अधिष्ठाता प्रदाता, यस्मै प्रत्ताः वेदाः अव- रुद्धाः, तानि एनानि ऐन्द्राणि) इसलिये ही क्षत्रिय [राजा] बहुत करके ही पशुओं का स्वामी है, जो अधिष्ठाता और बड़ा दाता है और जिसके लिये [ऋषियों को] दिये हुये वेद रक्षित हैं, वह ही यह सब इन्द्र के कर्म हैं ॥ (जागतानि शंसन्ति) जगती छन्द वाले [उक्थों] को वे बोलते हैं। (अथो एतैः एव सेन्द्रं तृतीयसवनम्, एतैः जागतं सवनम्) फिर इन [उक्थों] करके ही ७-(आग्नेयीषु) अग्निदेवताकासु ऋक्षु (प्रणयन्ति) प्रकर्षेण प्राप्नुवन्ति (अनपक्रान्त्यै) अचलतायै (प्रतिष्ठापयति) स्थापयति (ईशते) ईष्टे। ईश्वरो