भारतकोश
गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished600 पृष्ठ

पृष्ठ 553, कुल 600 में से

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करता है। (तस्मात् इमाः प्रजाः अदन्त्यः जायन्ते) इस लिए यह प्रजायें बिना दांत वाली उत्पन्न होती हैं [क्योंकि जीभ बिना दांत की है]। (तं ह एके प्रगाथानां पुर- स्तात् शंसन्ति, पुरस्तादायतना वाक् इति वदन्ते) उस [नाराशंस सूक्त] को ही कोई २ ऋषि प्रगाथों [दो दो मन्त्रों के समूहों] के पहिले बोलते हैं, [मुख में] पहिले स्थान वाली वाणी है · ऐसा वे कहते हैं। (एके उपरिष्टात्, उपरिष्टादायतना वाक् इति वदन्तः) कोई कोई [प्रगाथों के] पीछे [बोलते हैं], पीछे [मुख के मूर्धा आदि] स्थान वाली वाणी है-ऐसा वे कहते हैं। (मध्ये एव शंसेत्, मध्यायतना वै इयं वाक्) [प्रगाथों के] मध्य में ही [नाराशंस] बोले, मध्य [शरीर में नाभि हृदय आदि] स्थान वाली ही यह वाणी है। (उपरिष्टात् नेदीयसि इव तं रेतोभूतं शस्त्वा होता मैत्रावरुणाय संप्र- यच्छति) उपरान्त अत्यन्त निकट वाले [नाभानेदिष्ठ के सूक्त के अन्त के अत्यन्त समीप भाग] में ही उस वीर्य रूप सूक्त को बोल कर होता मैत्रावरुण को [यजमान को] देता है—(एतस्य प्राणान् त्वं कल्पयं इति) इसके प्राणों को तू समर्थ कर ॥ (बालखिल्याः शंसति) बालखिल्य ऋचाओं को [क० ७] वह [मैत्रावरुण] बोलता है। (प्राणाः वै बालखिल्याः अस्य प्राणान् एव तत् कल्पयति) प्राण ही बाल- खिल्य [स्वीकार योग्य के ग्रहण कराने वाले] हैं, इस [यजमान] के प्राणों को ही उससे वह समर्थ करता है। (ताः विहृताः शंसति, विहृताः वै प्राणाः, प्राणेन अपानः, अपा- नेन व्यानः) उन्हें आपस में मिली हुई वह बोलता है, आपस में मिले हुये ही प्राण [श्वास मात्र] हैं, प्राण [भीतर जाने वाले श्वास] के साथ अपान [बाहर निकलने वाला श्वास], और अपान के साथ व्यान [समस्त शरीर में फैला वायु मिला हुआ है]। (सः पच्छः प्रथमे सूक्ते विहरति, अर्धर्चशः द्वितीये, ऋक्शः तृतीये) वह पाद पाद करके पहिले सूक्त में [बालखिल्य ऋचाओं को] बोलता है आधी आधी ऋचाओं से दूसरे में ऋचा ऋचा से तीसरे में। (सः यत् प्रथमे सूक्ते विहरति, तत् वाचं च एव मनः च विहरति) वह जो पहिले सूक्त में [बालखिल्य ऋचाओं को] संयुक्त करता है उस से वाणी और मन को ही संयुक्त करता है। (यत् द्वितीये, तत् चक्षुः च एव श्रोत्रं च विहरति) वह जो दूसरे में [संयुक्त करता है।] उससे आंख और कान को ही संयुक्त करता है। (यत् तृतीये, तत् प्राणं च एव आत्मानं च विहरति) वह जो तीसरे [सूक्त] में [जोड़ता है], उससे प्राण को और आत्मा को ही वह जोड़ता है। (तत् उपाप्तः कामः, विहरेत्) उससे कामना प्राप्त हुई, वह [वैसा ही] जोड़े। (अन्ये तु वै प्रगाथाः कल्पयन्ते, अतिमशंम् एव सं विहरेत्) कोई कोई तो प्रगाथाओं को मानते सङ्गं प्राप्तः (निषिञ्चत्) निषिञ्चति (अदन्त्यः) नञ्+दन्त—ङीप्। दन्त- शून्याः (पुरस्तादायतना) पूर्वभागस्थाना (उपरिष्टादायतना) उपरिष्टात् मूर्ध्नि आयतनं स्थानं यस्याः सा (मध्यायतना) शरीरमध्ये नाभ्यादौ स्थानं यस्याः सा (उपरिष्टान्नेदीयसि) उपरिष्टात् नाभानेदिष्ठसूक्तस्यावसानभागस्यात्यन्तसमीपवर्तिनि भागे (इव) एव (विहृताः) परस्परव्यतिषिक्ताः। परस्परसंगताः (पच्छः) पद्—शः। पादेन पादेन (विहरति) योजयति। शंसति (उपाप्तः) प्राप्तः

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