गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 561, कुल 600 में से
संदर्भ में पढ़ेंगोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ६। क० ११ ५२३ और न यज्ञ के न.गिरे हुए प्रयोग से गिरते और [ न ] यज्ञों और प्राणों को प्रजा से और पशुओं से टेढ़ा करते हैं ॥ ( पारुच्छेपीः द्वयोः सवनयोः प्रस्थितयाज्यानां पुरस्तात् उपदधति ) पारुच्छेपी [ परुच्छेप की देखी ऋचाओं--अग्निं होतारं मन्ये-इत्यादि, ऋ० १ । सूक्त १२७-१३६ ] ऋचाओं को दोनों [ पहिले ] सवनों में प्रयोग के योग्य याज्याओं के पहिले वे धरते हैं । ( रोहितं वै नाम एतत् छन्दः यत् पारुच्छेपम् ) रोहित [ चढ़ने योग्य ] ही नाम यह छन्द है जो पारुच्छेप [ परुच्छेप ऋषि के सूक्तों वाला ] है । ( एतेन ह वै इन्द्रः सप्त स्वर्गान् लोकान् आ-अरोहत् ) इस [ रोहित छन्द ] से ही इन्द्र [ परम ऐश्वर्यवान् जीव ] सात स्वर्ग लोकों [अर्थात् भूः, भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः, सत्यम् सात व्याहृतियों से जिनका सम्बन्ध शिर, नेत्र, कण्ठ, हृदय, नाभि, पाद और शिर से है ] को चढ़ा । ( सप्त स्वर्गान् लोकान् आरोहति, यः एवं वेद ) सात स्वर्ग लोकों को वह चढ़ता है जो ऐसा विद्वान् है । ( तत् आहुः यत् पञ्चपदः एव पञ्चमस्य अह्नः रूपम्, षट्पदात् षष्ठस्य, अथ कस्मात् सप्तपदात् षष्ठे अहनि शस्यन्ते इति) फिर वे कहते हैं-पांच पाद वाली ऋचायें ही पांचवें दिन का रूप हैं, छह पद वाले मन्त्र से छठे का [ रूप है ], फिर किस लिए सात पाद वाले मन्त्र से छठे दिन में वे स्तुति करते हैं । ( षड्भिः एव पदैः षष्ठम् अहः अवाप्नुवन्ति, विच्छिद्ये'वं तत् अहः यत् सप्तमम् ) छह ही पादों से छठे दिन को वे प्राप्त करते हैं, काट लेने पर [ सातवां पाद निकाल देने पर ] ही वह दिन है जो सातवां है [ पारुच्छेपी सूक्त छन्दों और अतिछन्दों वाले हैं और अतिछन्दों में पांच, छह और सात पाद हैं ] । ( तत् एव सप्तमेन पदेन अभ्यारुह्य वसन्ति, संततैः अव्यवच्छिन्नैः त्र्यहैः यन्ति, ये एवं विद्वांसः उपयन्ति ) तब ही वे लोग सातवें पाद से चढ़कर बसते हैं और फैले हुए और न टूटे हुए तीन दिन वाले यज्ञों से चलते हैं, जो ऐसे विद्वान् आते हैं ॥ १० ॥ भावार्थः-मन्त्रों के यथावत् विचारपूर्वक प्रयोग करने से यज्ञ सिद्धि करनी चाहिए ॥१०॥ विशेषः-इस कण्डिका को ऐ० ब्रा० ५ । ६७, १० से मिलाओ ॥ कण्डिका ११ ॥ देवासुरा वा एषु लोकेषु समयतन्त । ते देवा षष्ठेनाह्ना एभ्यो लोकेभ्यो- ऽसुरान् पराणुदन्त । तेषां यान्यन्तर्हस्तानि वसून्यासन्, तान्यादायन् समुद्रं प्रारुप्यन्त । तेषां वै देवा अनुहायैतेनैव च्छन्दसा अन्तर्हस्तानि वसून्याददत । तदे- वैतत् पदं, पुनःपदम् । स वांकुश आकुञ्चनाया द्विषतो वसु दत्ते, निरेवैनमेभ्यः सर्वेभ्यो लोकेभ्यो नुदते, य एवं वेद । द्यौर्वे देवता¹ षष्ठमहर्वहति, त्रयस्त्रिंशस्तोमो रैवतं परुच्छेपेन महर्षिणा दृष्टाः ऋचः ( प्रस्थितयाज्यानाम् ) प्राप्तयाज्यानाम् ( पञ्च- पदः ) पंचपादोपेताः ( षट्पदात् ) षट्पाद्युक्ताच्छन्दसः ( सप्तपदात् ) सप्तपाद- युक्तात् ( विच्छिद्य ) छिदिर् द्वैधीकरणे-क्यप् । विच्छेदनीये सति ( सन्ततैः ) सम्+तनु विस्तारे-क्तः । विस्तृतैः (अव्यवच्छिन्नैः) विच्छेदरहितैः । परस्परसंयुक्तैः ॥ १. पू० सं० 'देवताः' इति पाठः ॥