गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 563, कुल 600 में से
संदर्भ में पढ़ेंगोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ६ । क० ११ ५९५ सामगान के अनुसार और छन्द के अनुसार वह समृद्ध होता है, जो ऐसा विद्वान् है। (यत् वै समानोदर्कं, तत् षष्ठस्य अह्नः रूपम्) जो ही समान अन्त कर्म है, वह छठे दिन का रूप है। (यदि एव प्रथमम् अहः, तत् उत्तमम् अहः, तत् एव एतत् पदम्) जो ही पहिला दिन है, वह ही सबसे पिछला दिन है [पहिले दिन के समान पिछले दिन काम होता है], वह ही वह पाद है। (पुनः यत् षष्ठं, यत् अश्ववत्, यत् रथवत्, यत् पुनरावृत्तम् यत् पुनर्निर्वृत्तं, यत् अन्तरूपं, यत् असौ अभ्युदितः लोकः यत् नाभानेदिष्ठं यत् पारुच्छेपं यत् नाराशंसं, यत् द्वैपदा, यत् सप्तपदा, यत् कृतं, यत् रैवतं, तत् तृतीयस्य अह्नः रूपम्) फिर जो छठा [दिन] है, जो अश्व शब्द वाला, जो रथ शब्द वाला, जो आवृत्ति वाला और जो पुनर्निवृत्ति वाला, और जो अन्तरूप वाला छन्द है, जो वह [सूर्य] उदय होता हुआ लोक है, जो नाभानेदिष्ठ, जो पारुच्छेप और जो नाराशंस सूक्त है, जो दो पाद वाली ऋचा और सात पाद वाली ऋचा है, जो कृत [भूत काल] है और जो रैवत साम है, वह तीसरे दिन का रूप [चिह्न] है। (एतानि वै षष्ठस्य अह्नः रूपाणि, षष्ठेन अह्ना अक्तानां छन्दसाम् उ रसः निनेजत्) यह ही छठे दिन के रूप हैं, छठे दिन के साथ मिले हुये छन्दों का रस पुष्ट किया जावे। (तं [तस्मै] प्रजापतिः उदानः ए [एव]) उस [यजमान] के लिये उदान वायु ही प्रजापालक है। (नारा- शंस्या गायत्र्या रैभ्या त्रिष्टुभा पारिक्षित्या जगत्या गाथया अनुष्टुभा) नाराशंसी, गायत्री, रैभी, त्रिष्टुप् पारिक्षिती [पारिक्षित शब्द वाली] जगती, गाथा और अनुष्टुप् ऋचा साथ [यह काम होता है]। (एतानि वै छन्दांसि षष्ठे अहनि अयातयामानि शस्तानि भवन्ति, तत् छन्दसाम् एव सरसतायै अयातयामतायै) यह ही छन्द छठे दिन में उचित समय के अनुकूल बोले गये होते हैं, यह काम छन्दों के ही रसीलेपन और उचित समय के अनुकूलपन के लिये है। (अस्य ह सरसानि छन्दांसि षष्ठे अहनि शस्तानि भवन्ति, सरसैः छन्दोभिः इष्टं भवति, सरसैः छन्दोभिः यज्ञं तनुते यः एवं वेद) उसके ही रसीले छन्द छठे दिन में बोले गये होते हैं, रसीले छन्दों से वह इष्ट [प्रिय पदार्थ] पाता है, और रसीले छन्दों से वह यज्ञ फैलाता है, जो ऐसा विद्वान् है॥ ११॥ भावार्थः- कण्डिका १० के समान है॥ ११॥ (द्यौः) प्रकाशलोकः। सूर्यः (वहति) निर्वहति। प्रवर्तयति (अतिच्छन्दः) गायत्र्यादि- सप्तछन्दोभ्यो अधिकाक्षरयुक्तं छन्दः (समानोदर्कम्) तुल्यसमाप्तिकम् (पुनरावृत्तम्) पुनरावृत्तियुक्तम् (पुनर्निर्वृत्तम्) पुनर्निष्पादितं । पुनः सिद्धम् (पारुच्छेपम्) परुच्छेपेन दृष्टम् (द्वैपदा) द्विपादोपेता ऋक् (सप्तपदा) सप्तपादोपेता। यथा पारुच्छेपी (कृतम्) भूतार्थवाचि प्रत्यययुक्तं धातुमात्रम् (अक्तानाम्) सङ्गतानाम् (निनेजत्) णिजिर् शौचपोषणयोः। शोधयेत्। पोषयेत् (पारिक्षित्या) परिक्षित्— अण्, ङीप्। परीक्षिच्छब्देनोपेत्या (अयातयामानि) उचितसमययोग्यानि (इष्टन््) अभिलषितम्। प्रियम् (भवति) प्राप्नोति (तनुते) विस्तारयति॥