भारतकोश
गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished600 पृष्ठ

पृष्ठ 565, कुल 600 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 565

गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ६। क० १२ ५२७ कण्डिका १२ ।। षडह यज्ञ में स्तोत्रिय, अनुरूप, सुकीर्ति, वृषाकपि, कुन्ताप [ अथर्व० २० । १२७-१३६ ], रैभी, पारिक्षिती, कारव्या, दिशां क्लृप्ती और इन्द्र गाथाओं का वर्णन ॥ १--( अथ यत् द्वैपदौ स्तोत्रियानुरूपौ भवतः इमा नु कं भुवना सीषधाम इति ) फिर जो दो पाद वाले स्तोत्रिय और अनुरूप स्तोत्र होते हैं—इमा नु कं भुवना सीषधाम—अथर्व० २०। ६३ । १, द्विपात् त्रिष्टुप्, यह मन्त्र बोला जाता है। (द्विपाद् वै पुरुषः, द्विप्रतिष्ठः पुरुषः, पुरुषः वै यज्ञः, तस्मात् द्वैपदौ स्तोत्रियानुरूपौ भवतः ) दो पांव वाला ही पुरुष है, दो प्रतिष्ठा वाला [ दोनों स्थूल और सूक्ष्म शरीर का आश्रय वाला ] पुरुष है, पुरुष ही यज्ञ है, इसलिये दो पाद वाले स्तोत्रिय और अनुरूप होते हैं ॥ २-(अथ सुकीर्ति शंसति अपेन्द्र प्राचो मघवन्नमित्रान् इति ) फिर सुकीर्ति [ सुकीर्ति ऋषि के देखे सूक्त ] को वह बोलता है—अपेन्द्र प्राचो मघवन्नमित्रान्—अथर्व० २० । १२५ । १-७, यह सूक्त है। ( देवयोनिःवै सुकीर्तिः, सः यः एवं देवयोन्याम् एतां सुकीर्ति वेदकीर्ति प्रतिष्ठापयति, भूतानां कीर्तिमान् स्वर्गे लोके प्रतितिष्ठति ) । विद्वानों का उत्पत्ति स्थान ही सुकीर्ति [ उत्तम यश ] है, वह जो पुरुष इस प्रकार विद्वानों के उत्पत्ति स्थान में इस सुकीर्ति, वेद कीर्ति को स्थापित करता है, वह प्राणियों के बीच कीर्तिमान् होता हुआ स्वर्ग लोक में प्रतिष्ठा पाता है । ( प्रजया पशुभिः प्रतितिष्ठति, यः एवं वेद ) प्रजा से और पशुओं से वह प्रतिष्ठा पाता है जो ऐसा विद्वान् है ॥ ३-( अथ वृषाकपि शंसति, वि हि सोतोरसृक्षत-इति) फिर वृषाकपि [ वृषाकपि ऋषि के देखे सूक्त ] को वह बोलता है, वि हि सोतोरसृक्षत ... अथर्व० २० । १२६ । १-२३, यह सूक्त है । ( आदित्यः वै वृषाकपिः यत् तत् कम्पयमानः रेतः वर्षति, तस्मात् वृषाकपिः, तत् वृषाकपेः वृषाकपित्वम् ) सूर्य ही वृषाकपि [ वृष्टि का कपाने वाला ] है, क्योंकि वह कांपता हुआ जल बरसाता है, इसलिये वृषाकपि है, यह ही वृषाकपि का वृषाकपित्व है। (वृषाकपिः इव वै सर्वेषु लोकेषु भाति, यः एवं वेद ) वृषाकपि, सूर्य के समान ही सब लोकों में वह चमकता है जो ऐसा विद्वान् है ! ( तस्य तृतीयेषु पादेषु आद्यन्तयोः न्यूङ्खनिनदौ करोति ) उस [ सूक्त ] के तीसरे पादों के बीच आदि अन्त में न्यूङ्ख [ ओंकार सहित मन्त्र उच्चारण ] के सहित निनदं [ ध्वनि विशेष ] करता है । ( अन्नं वै न्यूङ्खः, बलं निनदंः, अन्नाद्यम् एव अस्मै तत् १२-( द्वैपदौ ) द्विपाद्युक्तौ ( कम् ) सुखम् ( सीषधाम ) साधयेम ( द्विप्रतिष्ठः ) द्वे प्रतिष्ठे स्थूलसूक्ष्मशरीरूपाश्रयौ यस्य सः ( भूतानाम् ) प्राणिनां मध्ये ( वृषाकपिम् ) गो० उ० ६ । ७ । वृष्टेः कम्पयितारं चेष्टयितारं सूर्यम् ( वि ) वियोगे ( सोतोः ) ईश्वरे तोसुन्कसुनौ ( प० ३ । ४ । १३ ) षुञ् अभिषवे--तोसुन् । अभिषोतुम् । तत्त्वरसं निष्पादयितुम् ( असृक्षत ) विसृष्ट- वन्तः : त्यक्तवन्तः ( रेतः ) जलम् (वृषाकपिः) वृष्टेः कम्पयिता सूर्यः (न्यूङ्खनिन- नदांम् ) न्यूङ्खेन सह निनदं ध्वनिविशेषम् ( कुन्तापम् ) कुङ् आतंस्वरे-डु,