भारतकोश
गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished600 पृष्ठ

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पृष्ठ 74

३६ गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० १ । क० २१ ॥ कण्डिका १० ], (वाकः) वाक [ बोलने के सामर्थ्य ], (वाक्य१ गाथानाराशंसोः ) वाक्य [ पदों के मिलान ], गाथा [ गाने योग्य वेदमन्त्र आदि ] और नाराशंसी [ वीर नरों की गुण कथाओं-क० १० विशेषः १ देखो ] (अनुशासनानाम्) अनुशासनों [ शिक्षा वा उपदेशों ] की (उपनिषदः इति) उपनिषदों [ ब्रह्म विद्याओं ] अर्थात् - (वृधत्) वृधत् [ बढ़ती वाला परिपूर्ण ब्रह्म है ], (करत्) करत् [ सृष्टिकर्ता ब्रह्म है ], (गुहत्) गुहत् [ छिपा हुआ, अन्तर्यामी ब्रह्म है ], (महत्) महत् [ पूजनीय ब्रह्म है ] (तत्) तत् [ फैला हुआ ब्रह्म है -पांच महाव्याहृति, क० १०], (शम्) [ शान्ति वाला वा शान्तिकारक ब्रह्म है महाव्याहृति क० ११ ] और (ओम्) ओम् [ सर्वरक्षक ब्रह्म है महाव्याहृति-क० ५] [ इति व्याहृतीः) [ इन सात ] व्याहृतियों, (स्वरशम्य- न(नात्तन्त्रीः) स्वर से शान्त वा स्वस्थ करने वाली अनेक तन्त्रियों [वीणा आदि विद्याओं], (स्वरनृत्यगीतवादित्राणि) स्वर सहित नाचने, गाने, बजाने [मृदङ्ग आदि बाजों] की विद्याओं को (अन्वभवत्) उस [ब्रह्मा] ने बनाया । (चैत्ररथम्) विचित्र रमणीय गुण वाले (दैवतम्) दिव्य पदार्थों के समूह, (वैद्युतम्) विविध प्रकाश वाली (ज्योतिः) ज्योति [ सूर्य आदि ], (बार्हतम्) वेद वाणियों से जताये गये (छन्दः) आनन्ददायक कर्म, (तृणवत् त्रयस्त्रिंशौ) तीन कालों में स्तुति किये गये तैंतीस देवता वाले [कथं गायत्री...... अथर्व० ८ । ९ । २० ] (स्तोमौ) दो स्तुति योग्य व्यवहार [सृष्टि और प्रलय ], (ध्रुवाम् ऊर्ध्वां दिशम्) नीचे और ऊपर की दिशा, (हेमन्त- शिशिरौ ऋतू) हेमन्त और शिशिर दोनों ऋतुओं, (अध्यात्मम्) आत्मा के जत ने वाले यन्त्र [ अर्थात् ] (श्रोत्रम्) कान, (शब्दश्रवणम् इति) शब्द और सुनने के सामर्थ्य, (इन्द्रियाणि) इन्द्रियों [ज्ञान और कर्म के साधनों] को (अन्वभवत्) उस [ ब्रह्मा ] ने बनाया ॥ २१ ॥ २१- (वाकोवाक्यम्) वच व्यक्तायां वाचि-सर्वधातुभ्योऽसुन् (उ० ४। १९६) इति असुन् प्रत्ययान्तः 'वाकः' शब्दः ण्यत्प्रत्ययान्तश्च 'वाक्यम्'; ततश्चो- भयोः द्वन्द्वसमासः एकवद्भावश्च । वाकश्च वाक्यञ्चेति वाकोवाक्यम्, उक्ति- प्रत्युक्तिरूपमाख्यानम् (गाथा) उषिकुषिगा० (उ० २ । १४) गै गाने-थन् । गान योग्यवेदमन्त्रादिः (नाराशंसी) नर + शंसु स्तुतौ-अण्, दीर्घश्च, नाराशंस- स्वार्थे अण् ङीप् । येन नराः प्रशस्यन्ते स नाराशंसो मन्त्रः-निरु० ६ । ६ । वीर- नराणां कीर्तनानि (अनुशासनानि) शिक्षाः । उपदेशान् (उपनिषदः) उपनिषीदति प्राप्नोति ब्रह्म यथा । उप + नि + षद्लृ विशरणगत्यवसादनेषु- क्विप् । ब्रह्मविद्याः (शम्य = शम्याः) शमो दर्शने, शम आलोचने, शमु शान्ति- करणे-यत् । स्वस्थकारिकाः (नानातन्त्रीः) अवितृस्तृतन्त्रिभ्य ईः (उ० ३। १५८) नाना + तत्रि कुटुम्बधारणे-ईः प्रत्ययः । बहुविधवीणादिविद्याः (वादित्राणि) भृंवादिभ्यम्यो णित्रन् (उ० ४ । १७१) वद वाचि-णिच्-णित्रन् । मृदङ्गादीनां १॰ वाकोवाक्य प्रश्नोत्तरात्मक शैली के विभिन्न ग्रन्थों में आये स्थल विशेषों का नाम है। पूर्व ......संस्करण में मूलपाठ की भ्रष्टता से यहाँ अर्थ में असङ्गति हुई है ॥ सम्पा० ॥