गोरक्षशतकम् (गुरु गोरखनाथ - षडङ्ग हठयोग, कुण्डलिनी एवं प्राणायाम विधान सटीक)
Goraksha Shatakam of Guru Gorakhnath with Commentary
गुरु गोरखनाथ (टीकाकार: पं. मोतीलाल खद्दर शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १६ ) इस योग में अजपाजप का बहुत महत्व है जिसका निर्देश गोरखनाथ- मन्दिर वाले संस्करण में किया गया है। उस संस्करण में महामुद्रा, खेचरी मुद्रा, शक्तिचालिनी मुद्रा, महाबन्ध और उड्डियान बन्ध इनका फल सहित सुन्दर वर्णन है। शिव और शक्ति के प्रतीक-रूप बिन्दु और रज की शरीर में यौगिक अवस्थिति का भी योग-पद्धति से विश्लेषण किया गया है। कहा है- बिन्दु शिवो रज शक्तिश्चन्द्रो विन्दूरजो रविः । उभयो सङ्गमादेव प्राप्यते परम् पदम् ॥ वायुना शक्तिचारेण प्रेरित तु महारजः । याति विन्दोः सहैकत्वं भवेद् दिव्यवपुस्तदा ।। शुक्र चन्द्रेण संयुक्तं रजः सूर्येण संयुतम् । तयोः समरसैकत्वं यो जानाति स योगविद् ॥ (गोर.शत., गोरखनाथ-मन्दिर सं., श्लो. : ७४-७६) • बिन्दु (वीर्य) शिव है और रज शक्ति है। बिन्दु चन्द्रमा है और रज सूर्य है। (चन्द्र-स्थान में पाण्डुर वर्ण का बिन्दु (शुक्र) रहता है और सूर्य स्थान (नाभि) में सिन्दूर वर्ण का रज रहता है) इन दोनों के संगम से (योगी को) परम पद की प्राप्ति होती है। • वायु के द्वारा शक्ति के चालन से जब महा रज ऊपर उठकर बिन्दु के साथ मिलकर एक हो जाता है, तब शरीर दिव्य हो जाता है। • शुक्र चन्द्रमा से संयुक्त है और रज सूर्य से संयुक्त है। जो इन दोनों का सामरस्य-ऐक्य जानता है, वह योगवित् है। साधना कुण्डलिनी की हो या चन्द्रमा-सूर्य से सम्बन्धित बिन्दु-रज की, शिव-शक्ति का सामरस्य ही लक्ष्य है। गोरख की योग पद्धति में तन्त्रयोग का अद्भुत सामञ्जस्य है। ऐसा हठयोग में भी है। गोरक्षशतक में गोरख की योग-पद्धति के सिद्धान्त और प्रक्रिया का दिग्दर्शन हो जाता है। जिससे उसके विस्तार का द्वार खुल जाता है। यह गोरख की परम्परा में मान्य पुस्तक है। इन कारणों से इसे पढ़ा जाना चाहिए। मास्टर जी द्वारा हिन्दी अनुवाद उपलब्ध करा देने से उसमें सुविधा होगी।