भारतकोश
संग्रह पर लौटें

गोरक्षशतकम् (गुरु गोरखनाथ - षडङ्ग हठयोग, कुण्डलिनी एवं प्राणायाम विधान सटीक)

Goraksha Shatakam of Guru Gorakhnath with Commentary

गुरु गोरखनाथ (टीकाकार: पं. मोतीलाल खद्दर शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished45 पृष्ठ

.( ३६ ) गोरक्षनाथप्रणीतः जब प्राण क्षीण हो जाते है, मन विलीन हो जाता है। तब समरसत्व (एकरसत्व) हो जाता है, वही समाधि है ।। ९४ ।। (श्लोक संख्या ९५ लुप्त है) ❁ ❁ ❁ धारणाः पंचनाड्यस्तु ध्यानं च षष्टिनाडिकाः । दिनद्वादशकेनैव समाधिः प्राणसंयमः ।। ९६ ।। धारणा पांच नाड़ी (दण्ड-चौबीस मिनट का एक दण्ड या एक नाड़ी होती है)। और साठ नाड़ी तक ध्यान होता है। बारह दिनों तक समाधि होती है। यही तक प्राण-संयम होता है ।। ९६ ।। न गंधं न रसं रूपं न स्पर्शं न च निःस्वनम् । आत्मानं न परं वेत्ति योगी युक्तः समाधिना ।। ९७ ।। जब योगी के समक्ष (उसके चित्त में) न गन्ध रहती है, न रस रहता है न रूप रहता है, न स्पर्श रहता है, न शब्द रहता है। और वह आत्मा से भिन्न कुछ भी नहीं जानता (देखता) तो यह समाधि है। (ऐसा होना समाधि में ही संभव है। और ऐसा योगी मुक्त योगी है।) ।। ९७ ।। खाद्यते न च कालेन बाध्यते न च कर्मणा । साध्यते न च केनापि योगी युक्तः समाधिना ।। ९८ ।। समाधि से युक्त ऐसा योगी काल (मृत्यु) के द्वारा कवलित नहीं होता कर्म से बाधित नहीं होता, और किसी के द्वारा साधित भी नहीं होता ।। ९८ ।। निर्मलं निश्चलं नित्यं निष्क्रिय निर्गुणं महत् । व्योमविज्ञानमानंदं ब्रह्म ब्रह्मविदो विदुः ।। ९९ ।। ब्रह्म निर्मल, निश्चल, नित्य, निष्क्रिय, महत् व्योम-रूप, विज्ञान-रूप आनन्द-रूप है। ब्रह्मविद् यह जानते है ।। ९९ ।। दुग्धे क्षीरं घृते सर्पिरग्नौ वह्निरिवार्पितः । अद्वयत्वं व्रजेन्नित्यं योगवित्परमे पदे ।। १०० ।। जिस प्रकार दुग्ध में क्षीर, घृत में सर्पिस (घृत) और अग्नि में वह्नि

गोरक्षशतकम् ( ३७ ) अर्पित किया जाता है । (युग्म के दोनों शब्द एक ही अर्थ के द्योतक है ) उसी प्रकार योगविद् परम पद में अद्वयभाव से नित्य निवास करते हैं ।। १०० ।। भवभयवने वह्निर्मुक्तिसोपानमार्गतः । अद्वयत्वं व्रजेन्नित्यं योगवित्परमे पदे ।। १०१ ।। संसार के भय के जंगल में अग्नि के समान, मुक्ति के सोपान- मार्ग से परम पद में अवस्थित होकर योगविद् नित्य (निरन्तर) अद्वय रूप में रहते हैं ।। १०१ ।। ।। इति श्री गोरक्षनाथप्रणीतः गोरक्षशतकम् समाप्तम् ।।

श्री पीताम्बरा पीठ ह्लीं दतिया (म.प्र.) PRINTED AT : SHIV SHAKTI PRESS, NAGPUR