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गोरक्षशतकम् (गुरु गोरखनाथ - षडङ्ग हठयोग, कुण्डलिनी एवं प्राणायाम विधान सटीक)

Goraksha Shatakam of Guru Gorakhnath with Commentary

गुरु गोरखनाथ (टीकाकार: पं. मोतीलाल खद्दर शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished45 पृष्ठ

गोरक्षशतकम् ( ३७ ) अर्पित किया जाता है । (युग्म के दोनों शब्द एक ही अर्थ के द्योतक है ) उसी प्रकार योगविद् परम पद में अद्वयभाव से नित्य निवास करते हैं ।। १०० ।। भवभयवने वह्निर्मुक्तिसोपानमार्गतः । अद्वयत्वं व्रजेन्नित्यं योगवित्परमे पदे ।। १०१ ।। संसार के भय के जंगल में अग्नि के समान, मुक्ति के सोपान- मार्ग से परम पद में अवस्थित होकर योगविद् नित्य (निरन्तर) अद्वय रूप में रहते हैं ।। १०१ ।। ।। इति श्री गोरक्षनाथप्रणीतः गोरक्षशतकम् समाप्तम् ।।

श्री पीताम्बरा पीठ ह्लीं दतिया (म.प्र.) PRINTED AT : SHIV SHAKTI PRESS, NAGPUR