भारतकोश
गोविन्द भाष्य (श्रील बलदेव विद्याभूषण - अचिन्त्यभेदाभेद वेदान्त ब्रह्मसूत्र भाष्य सटीक)

गोविन्द भाष्य (श्रील बलदेव विद्याभूषण - अचिन्त्यभेदाभेद वेदान्त ब्रह्मसूत्र भाष्य सटीक)

Govinda Bhashya of Baladeva Vidyabhushana with Commentary

श्रील बलदेव विद्याभूषण (संपादक: कृष्णदास बाबा जी) द्वारा

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॥ द्युभ्वाद्यधिकरणम् ॥ सूत्रम् ४: प्राणभृच्च ॥ १।३।४ ॥ पदच्छेदः — प्राणभृत्, च। पदविभागार्थः — प्राणभृत् = जीवः; च = अपि (समुच्चयार्थे)। सूत्रार्थः — पूर्वोक्त कारणों से ही 'प्राणभृत्' अर्थात् जीव भी द्यु, भूमि आदि का आयतन (आधार) नहीं हो सकता। श्रील बलदेव विद्याभूषण विरचित गोविन्दभाष्य (भावार्थ): पूर्वसूत्र (१।३।३) से 'न' तथा हेतुसूचक पद 'तच्छब्दात्' की यहाँ अनुवृत्ति होती है। यहाँ प्रयुक्त 'आत्म' शब्द भी जीवपरक नहीं हो सकता, क्योंकि 'अत सातत्यगमने' धातु से निष्पन्न 'आत्मा' शब्द मुख्यतया सर्वव्यापक परमपुरुष भगवान् का ही वाचक है। इसके अतिरिक्त, 'यः सर्वज्ञः सर्ववित्' (जो सर्वज्ञ तथा सर्वविद् हैं) यह श्रुति-वचन भी अल्पज्ञ जीव के लिए उपयुक्त नहीं हो सकता। अतः इन सभी कारणों से, उपनिषद् के इस प्रकरण के शब्द जीव के प्रति सङ्गत न होने से, यह सिद्ध होता है कि जीव 'द्युभ्वाद्यायतन' (स्वर्ग, पृथ्वी आदिका आश्रय) नहीं है। सूत्रम् ५: भेदव्यपदेशाच्च ॥ १।३।५ ॥ पदच्छेदः — भेद-व्यपदेशात्, च। पदविभागार्थः — भेद = भेद का; व्यपदेशात् = कथन होने से; च = तथा/भी। सूत्रार्थः — और (जीव एवं परब्रह्म के मध्य) स्पष्ट रूप से भेद का व्यपदेश (निरूपण) होने से भी जीव द्युभ्वाद्यायतन नहीं है। श्रील बलदेव विद्याभूषण विरचित गोविन्दभाष्य (भावार्थ): जीव 'द्यु-भू-आदि का आयतन' नहीं है, क्योंकि श्रुतियाँ जीव और परमेश्वर में परस्पर भेद का स्पष्ट निरूपण करती हैं। जैसा कि मुण्डकोपनिषद् (२।२।५) में कहा गया है: "तमेवैकं जानथ आत्मानम्" (केवल उसी अद्वितीय परमात्मा को जानो)। यहाँ ज्ञातारूप साधक (जीव) से ज्ञेयरूप परमात्मा के भेद का स्पष्ट निर्देश होने के कारण सिद्धान्ततः परब्रह्म ही द्युभ्वाद्यायतन हैं।