गोविन्द भाष्य (श्रील बलदेव विद्याभूषण - अचिन्त्यभेदाभेद वेदान्त ब्रह्मसूत्र भाष्य सटीक)
Govinda Bhashya of Baladeva Vidyabhushana with Commentary
श्रील बलदेव विद्याभूषण (संपादक: कृष्णदास बाबा जी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें'तरति शोकमात्मवित्' (छान्दोग्य उपनिषद् ७.१.३) (आत्मवेत्ता शोक को पार कर जाता है) से आरम्भ कर अन्त में पुनः जीवात्मा का ही निरूपण करते हुए श्रुति कहती है—'आत्मन एवेदं सर्वम्' (छान्दोग्य उपनिषद् ७.२६.१) (आत्मा से ही यह सब है); अतः इन दोनों वचनों के मध्य में स्थित 'भूमा' का वर्णन भी निश्चय ही जीवात्मा का ही वर्णन होना चाहिए। जब उपनिषद् कहती है—'यत्र नान्यत् पश्यति' (छान्दोग्य उपनिषद् ७.२५.१) (जहाँ अन्य किसी को नहीं देखता), तब इस व्याख्या के अनुसार इसका अर्थ यह है कि जब जीवात्मा सुषुप्ति-अवस्था में निमग्न रहता है तथा उसकी समस्त इन्द्रियाँ मुख्यप्राण के वशीभूत होती हैं, तब वह अपने अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं देखता। जब उपनिषद् कहती है—'यो वै भूमा तत् सुखम्' (छान्दोग्य उपनिषद् ७.२३.१) (जो भूमा है वही सुख है), तब यह कथन भी भूमा के जीव होने के विचार का विरोध नहीं करता; क्योंकि श्रुति-शास्त्र में 'तस्यां सुखमहमस्वाप्सम्' (सुषुप्ति में मैं सुखपूर्वक सोया) का अनुभव सुप्रसिद्ध है। इस प्रकार यह सिद्ध होता है कि उपनिषद् का यह प्रकरण जीवात्मा का ही निरूपण करता है। इस प्रकरण के अन्य समस्त अंश भी जीव-परक व्याख्या के ही सर्वथा अनुकूल हैं। ऐसा पूर्वपक्ष उपस्थित होने पर— सिद्धान्त: सूत्रकार कहते हैं— सूत्र ८ भूमा सम्प्रसादादध्युपदेशात् ॥ १।३।८ ॥ पदच्छेद एवं शब्दार्थ: भूमा — भूमा (सर्वव्यापक परब्रह्म); सम्प्रसादात् — सम्प्रसाद (भगवत्कृपापात्र जीव अथवा सुषुप्ति/प्राण) की अपेक्षा; अधि — अधिक (श्रेष्ठ/उत्कृष्ट); उपदेशात् — शास्त्र में उपदेश होने के कारण। सूत्रार्थ: यहाँ 'भूमा' शब्द से परम पुरुषोत्तम श्रीभगवान् (परब्रह्म) का ही प्रतिपादन है; क्योंकि श्रुति में जीवात्मा (सम्प्रसाद) से भूमा का श्रेष्ठतर रूप में उपदेश किया गया है। श्रील बलदेव विद्याभूषण-कृत गोविन्दभाष्य का तात्पर्य: यहाँ 'भूमा' शब्द से साक्षात् भगवान् श्रीविष्णु का ही ग्रहण होता है, प्राण-सहचर जीव का नहीं। ऐसा क्यों? इसके उत्तर में सूत्रकार कहते हैं—'सम्प्रसादादध्युपदेशात्' (क्योंकि शास्त्र में परमेश्वर को जीवात्मा से श्रेष्ठ बताया गया है)। 'यो वै भूमा तत् सुखम्' (छान्दोग्य उपनिषद् ७.२३.१) (जो भूमा है वही सुख है)— इस श्रुति-वचन के द्वारा भूमा को असीम परम आनन्दस्वरूप कहा गया है, तथा सूत्र स्पष्ट करता है कि भूमा सबसे श्रेष्ठ है, अतः भूमा परब्रह्म परमेश्वर ही हैं। अथवा, छान्दोग्य उपनिषद् (८.३.४) के इस वचन में— 'एष सम्प्रसादोऽस्माच्छरीरात् समुत्थाय' (भगवत्कृपा प्राप्त जीव स्थूल शरीर से ऊपर उठकर परम ज्योतिर्मय स्वरूप को प्राप्त होता है), 'सम्प्रसाद' शब्द जीव का बोधक है। शास्त्र में परमेश्वर को उस जीव से श्रेष्ठ बतलाया गया है, जो अपनी स्थिति के लिए प्रभु-कृपा पर निर्भर है तथा प्राण जिसका नित्य सहचर है। अभिप्राय यह है कि नामादि समस्त सोपानों का वर्णन करने के पश्चात्, छान्दोग्य उपनिषद् (७.१५.२) में कहा गया है: 'स वा एष एवं पश्यन्नेवं मन्वान एवं विजानन्नति...'