गोविन्द भाष्य (श्रील बलदेव विद्याभूषण - अचिन्त्यभेदाभेद वेदान्त ब्रह्मसूत्र भाष्य सटीक)
Govinda Bhashya of Baladeva Vidyabhushana with Commentary
श्रील बलदेव विद्याभूषण (संपादक: कृष्णदास बाबा जी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें॥ अधिकरणम् ३ ॥ "अक्षर" शब्द परब्रह्म (परम पुरुषोत्तम भगवान्) का वाचक है श्रीलबलदेवविद्याभूषणविरचिता भूमिका विषयः बृहदारण्यकोपनिषदि (३.८.७-८) श्रूयते— "कस्मिन् खलु आकाश ओतश्च प्रोतश्चेति। स होवाच—एतद् वै तदक्षरं गार्गि ब्राह्मणा अभिवदन्त्यस्थूलमनण्वह्रस्वमदीर्घमलोहितमस्नेहमच्छायम्..." (हिन्दी अनुवाद: "यह आकाश किसमें ओत-प्रोत है?" उन्होंने कहा: "हे गार्गि! ब्रह्मवेत्ता उसे ही 'अक्षर' कहते हैं। वह न स्थूल है, न सूक्ष्म, न ह्रस्व, न दीर्घ, न लाल वर्ण वाला, न स्नेह (तरल), और न ही छायारूप है।") संशयः यहाँ "अक्षर" शब्द से किसका ग्रहण होता है—प्रधान (प्रकृति) का, जीव का, अथवा परम पुरुषोत्तम भगवान् का? पूर्वपक्षः श्वेताश्वतरोपनिषद् आदि के अनुसार 'अक्षर' शब्द इन तीनों में से किसी का भी वाचक हो सकता है, अतः इसका अर्थ संदिग्ध है। सिद्धान्तः इसके समाधान हेतु अग्रिम सूत्र का अवतार होता है— सूत्र १० अक्षरमम्बरान्तधृतेः ॥ १० ॥ पदच्छेदः अक्षरम्, अम्बरान्त-धृतेः। शब्दार्थः अक्षरम् = 'अक्षर' शब्द परमेश्वर का वाचक है; अम्बरान्त-धृतेः = आकाश पर्यन्त समस्त प्रपञ्च को धारण करने के कारण। सूत्रार्थ (हिन्दी अनुवाद): यहाँ श्रुति में प्रयुक्त "अक्षर" शब्द परम पुरुषोत्तम भगवान् का ही प्रतिपादक है, क्योंकि स्थूल भूत से लेकर आकाश पर्यन्त सम्पूर्ण सृष्टि के आधार रूप में उसी का निरूपण किया गया है। श्रीलबलदेवविद्याभूषणविरचितं गोविन्दभाष्यम् (तात्पर्य) यहाँ "अक्षर" शब्द केवल परम पुरुषोत्तम भगवान् का ही वाचक है। ऐसा क्यों? क्योंकि सूत्र कहता है—"अम्बरान्तधृतेः" (आकाश पर्यन्त समस्त तत्त्वों का आधार होने के कारण)। उपनिषद् का वचन है: "एतस्मिन् खलु अक्षरे गार्ग्याकाश ओतश्च प्रोतश्च" (हे गार्गि! इसी अक्षर-तत्त्व में ही आकाश ओत-प्रोत है)।