गोविन्द भाष्य (श्रील बलदेव विद्याभूषण - अचिन्त्यभेदाभेद वेदान्त ब्रह्मसूत्र भाष्य सटीक)
Govinda Bhashya of Baladeva Vidyabhushana with Commentary
श्रील बलदेव विद्याभूषण (संपादक: कृष्णदास बाबा जी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीहरिः, न तु जीवः। (अन्तिम निष्कर्ष का पूर्व-वाक्य) अधिकरण ६ : अङ्गुष्ठमात्रप्रमिताधिकरणम् अङ्गुष्ठमात्र पुरुष साक्षात् परम पुरुषोत्तम भगवान् ही हैं श्रील बलदेव विद्याभूषण द्वारा भूमिका (गोविन्दभाष्य) : विषय : कठोपनिषद् (२.१.१२) में निम्नलिखित मन्त्र आता है : अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषो मध्य आत्मनि तिष्ठति । ईशानो भूतभव्यस्य ततो न विजुगुप्सते ॥ अनुवाद : "अङ्गुष्ठ-परिमाण (अंगूठे के बराबर) वाला पुरुष अन्तःकरण (हृदय) के मध्य में स्थित है। वह भूत और भविष्य का पूर्ण नियन्ता एवं स्वामी है। अतः वह किसी से भय या जुगुप्सा नहीं करता।" संशय : क्या यह अङ्गुष्ठ-परिमाण वाला पुरुष संसारी जीव है अथवा भगवान् श्रीविष्णु (परमेश्वर)? पूर्वपक्ष : यहाँ अङ्गुष्ठमात्र पुरुष जीव ही है; क्योंकि श्वेताश्वतरोपनिषद् (५.७-८) में कहा गया है : "प्राणाधिपः सञ्चरति स्वकर्मभिरङ्गुष्ठमात्रो रवितुल्यरूपः" (अर्थात् प्राणों का स्वामी जीव अपने कर्मों के अनुसार संसरण करता है, वह अङ्गुष्ठमात्र परिमाण वाला तथा सूर्य के समान तेजस्वी है)। सिद्धान्त : इसके समाधानार्थ सूत्र का अवतार होता है— सूत्र २४ : शब्दादेव प्रमितः ॥ २४ ॥ पदच्छेद एवं शब्दार्थ : शब्दात् — शब्द से ही ('ईशान' आदि परमेश्वर-प्रतिपादक श्रुति-शब्द के कारण); एव — ही; प्रमितः — परिमित / अङ्गुष्ठमात्र परिमाण वाला। सूत्रार्थ : यद्यपि वह अङ्गुष्ठमात्र परिमित प्रतीत होता है, तथापि श्रुति में प्रयुक्त 'ईशान' आदि साक्षात् भगवद्वाचक शब्दों के कारण वह परम पुरुषोत्तम भगवान् ही हैं। श्रील बलदेव विद्याभूषण विरचित भाष्य-तात्पर्य : यहाँ अङ्गुष्ठ-परिमाण वाला पुरुष साक्षात् भगवान् श्रीविष्णु ही हैं। किस कारण से? सूत्र कहता है—'शब्दात्' अर्थात् 'ईशान' शब्द के श्रवण से।