भारतकोश
गोविन्द भाष्य (श्रील बलदेव विद्याभूषण - अचिन्त्यभेदाभेद वेदान्त ब्रह्मसूत्र भाष्य सटीक)

गोविन्द भाष्य (श्रील बलदेव विद्याभूषण - अचिन्त्यभेदाभेद वेदान्त ब्रह्मसूत्र भाष्य सटीक)

Govinda Bhashya of Baladeva Vidyabhushana with Commentary

श्रील बलदेव विद्याभूषण (संपादक: कृष्णदास बाबा जी) द्वारा

DevanagariHindipublished647 पृष्ठ

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संशयः — क्या यहाँ 'अजा' शब्द का अर्थ सांख्य का 'प्रधान' है, अथवा इस उपनिषद् में वर्णित ब्रह्म की शक्ति है? पूर्वपक्षः — किसी भी बाह्य सहायता के बिना अजन्मा प्रकृति ही असंख्य जीवों की सृष्टि करती है। सिद्धान्तः — इस विषय में, सांख्यों के सृष्टि-सम्बन्धी मत के निवारणार्थ वे (सूत्रकार) कहते हैं — सूत्र ८ चमसवदविशेषात् ॥ ८ ॥ पदच्छेदः — चमस-वत् (चमस अर्थात् पात्र के सदृश); अविशेषात् (विशेष लक्षण न होने के कारण)। (श्वेताश्वतरोपनिषद् ४.५ में प्रयुक्त 'अजा' शब्द सांख्योक्त प्रकृति का वाचक नहीं है) क्योंकि यहाँ किसी विशेष का निरूपण नहीं है। यह बृहदारण्यकोपनिषद् २.२.३ के 'चमस' शब्द के दृष्टान्त के समान है। श्रील बलदेव विद्याभूषण विरचित तात्पर्य / गोविन्दभाष्य इस सूत्र में पूर्वसूत्र १.४.५ से 'न' (नहीं) शब्द की अनुवृत्ति करनी चाहिए। यहाँ प्रतिपादित अजा को सांख्य-स्मृति में वर्णित प्रकृति नहीं कहा जा सकता। क्यों? क्योंकि इस प्रसंग में प्रकृति का कोई विशेष लक्षण निर्दिष्ट नहीं किया गया है। विशेष लक्षण का अभाव होने से, केवल 'न जायते' (जो उत्पन्न नहीं होती) इस व्युत्पत्ति के आधार पर 'अजा' शब्द से अजन्मा होना मात्र सूचित होता है। यह चमस के दृष्टान्त के समान ही है। बृहदारण्यकोपनिषद् (२.२.३) में कहा गया है — "अर्वाग्बिलश्चमस ऊर्ध्वबुध्नः" "अधोमुख छिद्र (बिल) वाला और ऊपर पेंदे (बुध्न) वाला एक चमस (पात्र) है।" यहाँ 'चम्' (आस्वादन करना/पीना) धातु से व्युत्पन्न 'चमस' शब्द को इस मन्त्र में केवल यज्ञ में प्रयुक्त साधारण सोमपान-पात्र रूप से ग्रहण करना सम्भव नहीं है। व्युत्पत्ति के सन्दर्भ के बिना किसी शब्द के तात्त्विक अर्थ का निर्धारण नहीं हो सकता। अतः इस मन्त्र में प्रयुक्त शब्द को सांख्य-स्मृति-वर्णित प्रकृति के रूप में व्याख्यायित करना सर्वथा असम्भव है। यह इसलिए भी सम्भव नहीं है क्योंकि सांख्य-स्मृति यह मानती है कि प्रकृति स्वतंत्र रूप से जीवों की सृष्टि करती है। यहाँ 'अजा' शब्द वस्तुतः वेदों में वर्णित परम पुरुष भगवान् की अचिन्त्य शक्ति है। इस अर्थ को स्वीकार करने का विशेष हेतु बताते हुए, वे आगे कहते हैं —