भारतकोश
गोविन्द भाष्य (श्रील बलदेव विद्याभूषण - अचिन्त्यभेदाभेद वेदान्त ब्रह्मसूत्र भाष्य सटीक)

गोविन्द भाष्य (श्रील बलदेव विद्याभूषण - अचिन्त्यभेदाभेद वेदान्त ब्रह्मसूत्र भाष्य सटीक)

Govinda Bhashya of Baladeva Vidyabhushana with Commentary

श्रील बलदेव विद्याभूषण (संपादक: कृष्णदास बाबा जी) द्वारा

DevanagariHindipublished647 पृष्ठ

पृष्ठ 156, कुल 647 में से

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तस्मादव्यक्तमुत्पन्नं त्रिगुणं द्विजसत्तम ॥ "हे द्विजश्रेष्ठ! उस (परमेश्वर) से ही यह त्रिगुणात्मक अव्यक्त (प्रकृति) उत्पन्न हुआ है, जो परमपुरुष भगवान् से ही प्रादुर्भूत हुआ।" शास्त्र के ये वचन प्रधान तथा अन्य तत्त्वों की सृष्टि का स्पष्ट रूप से प्रतिपादन करते हैं। इस प्रकार शास्त्र यह शिक्षा देते हैं कि प्रधान सृष्ट होता है और वह एक ही साथ कारण तथा कार्य दोनों रूप है। श्रीविष्णुपुराण में इसे इस प्रकार समझाया गया है: प्रधानपुंसोरजयोः कारणं कार्यभूतयोः । "भगवान् विष्णु ही अजन्मा प्रधान तथा पुरुष के भी कारण हैं।" सृष्टि के समय प्रधान में प्रकृति के तीन गुण उद्भूत होते हैं और प्रधान विविध नामों से अभिव्यक्त होता है, जैसे 'प्रधान-अव्यक्त', तथा रक्त आदि विविध वर्णों के रूपों में प्रकट होता है। उस समय यह कहा जाता है कि प्रधान परंज्योति से उत्पन्न हुआ है (ज्योतिरुपन्ना)। अनन्तर वे (सूत्रकार) एक दृष्टान्त देते हैं: "मध्वादि के समान (मध्वादिवत्)।" सूर्य कारण रूप में रहते हुए एक ही रहता है, और जब वह कार्य रूप होता है, तब वह अन्य वस्तुओं के रूप में परिणत होता है, जैसे वसुओं द्वारा उपभोग किया जाने वाला मधु। इस प्रकार सूर्य एक ही साथ कारण और कार्य दोनों है। इसमें कोई विरोध नहीं है। अधिकरण ३ बृहदारण्यकोपनिषद् ४.४.१७ में प्रयुक्त "पञ्च-पञ्च-जनाः" पद सांख्य-प्रतिपादित पञ्चविंशति तत्त्वों का वाचक नहीं है विषय: बृहदारण्यकोपनिषद् ४.४.१७ में कहा गया है: यस्मिन् पञ्च पञ्चजना आकाशश्च प्रतिष्ठितः । तमेव मन्य आत्मानं विद्वान् ब्रह्मामृतोऽमृतम् ॥ "जिस (परब्रह्म) में पञ्च-पञ्च-जन और आकाश प्रतिष्ठित हैं, उसी अमृतस्वरूप आत्मा को ब्रह्म जानकर मैं अमृतमय हो गया हूँ।" संशय: क्या 'पञ्च-पञ्च-जनाः' पद कपिल-तन्त्र (सांख्य) में वर्णित पचीस तत्त्वों का वाचक है, अथवा किन्हीं अन्य पाँच पदार्थों का? पूर्वपक्ष: क्योंकि 'पञ्च-पञ्च' एक बहुव्रीहि-समास है और 'पञ्च-पञ्च-जनाः' एक कर्मधारय-समास है, अतः 'पञ्च-पञ्च-जनाः' पद कपिल-प्रतिपादित पचीस तत्त्वों को ही लक्षित करता है। आत्मा और आकाश ये दो तत्त्व यहाँ किसी प्रकार इस सूची में अतिरिक्त जोड़ दिए गए हैं। यहाँ 'जन' शब्द का अर्थ तत्त्व है। सिद्धान्त: सूत्रकार कहते हैं:

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