गोविन्द भाष्य (श्रील बलदेव विद्याभूषण - अचिन्त्यभेदाभेद वेदान्त ब्रह्मसूत्र भाष्य सटीक)
Govinda Bhashya of Baladeva Vidyabhushana with Commentary
श्रील बलदेव विद्याभूषण (संपादक: कृष्णदास बाबा जी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंइस संशय के समाधान हेतु सूत्रकार कहते हैं: सूत्र १८ अन्यार्थं तु जैमिनिः प्रश्नव्याख्यानाभ्यामपि चैवमेके ॥ १८ ॥ पदच्छेद एवं शब्दार्थ: अन्यार्थम् — अन्य अर्थ/प्रयोजन के लिए; तु — किन्तु (संशय-निवारणार्थ); जैमिनिः — आचार्य जैमिनि; प्रश्नव्याख्यानाभ्याम् — प्रश्न तथा व्याख्यान (उत्तर) से; अपि — भी; च — तथा; एवम् — इस प्रकार; एके — अन्य (वाजसनेयी आदि) शाखा के पाठ में। सूत्रार्थ: आचार्य जैमिनि का मत है कि यहाँ जीव का उल्लेख अन्य प्रयोजन (ब्रह्म-प्रतिपादन) के लिए ही है; क्योंकि प्रश्न और उत्तर से ऐसा ही सिद्ध होता है, तथा अन्य शाखा (वाजसनेयि-शाखा) के पाठ में भी इसी प्रकार का भेद स्पष्ट रूप से वर्णित है। श्रील बलदेव विद्याभूषण विरचित गोविन्दभाष्य तात्पर्य: यहाँ 'तु' शब्द पूर्वपक्षीय संशय का निराकरण करने के लिए प्रयुक्त हुआ है। यहाँ जीव का वर्णन एक भिन्न अर्थ (प्रयोजन) से किया गया है। आचार्य जैमिनि मानते हैं कि यह प्रसंग ब्रह्म और जीव के भेद को ही स्पष्ट रूप से प्रतिपादित करता है। यह कैसे सिद्ध होता है? क्योंकि इस प्रसंग में प्रश्न और उत्तर दोनों ही इसी बात को प्रमाणित करते हैं। प्रश्न सुप्त और जाग्रत अवस्था वाले जीवात्मा के विषय में पूछे गए हैं, जो कि मुख्य प्राण से भिन्न है। श्रुति-पाठ इस प्रकार है: "क्वॆष एतद्बालाके पुरुषोऽशयिष्ट क्व वा एतदभूत् कुत एतदागात्" (अर्थात् हे बालाके! सुषुप्ति के समय यह पुरुष कहाँ शयन कर रहा था? यह कहाँ स्थित था? और जाग्रत होने पर यह कहाँ से लौट आया?)। इस प्रश्न में ब्रह्म और जीव के मध्य स्पष्ट भेद लक्षित होता है। इसका उत्तर श्रुति में दिया गया है: "यदा सुप्तः स्वप्नं न कञ्चन पश्यत्यथास्मिन् प्राण एवैकधा भवति" (अर्थात् जब वह सुषुप्त होता है और कोई स्वप्न नहीं देखता, तब वह इसी प्राण में एकीभूत हो जाता है)। इसके पश्चात् का श्रुति-वाक्य: "एतस्मादात्मनः प्राणा यथायतनं विप्रतिष्ठन्ते प्राणेभ्यो देवा देवेभ्यो लोकाः" (अर्थात् इस परमात्मा रूप आत्मा से ही समस्त प्राण-इन्द्रियाँ अपने-अपने अधिष्ठानों में प्रवृत्त होती हैं, प्राणों से देवता और देवताओं से समस्त लोक प्रकट होते हैं) ब्रह्म और जीव के पारस्परिक भेद को ही दर्शाता है। यहाँ 'प्राण' शब्द का वास्तविक अर्थ परमेश्वर परमात्मा ही है; क्योंकि परमात्मा ही सुषुप्ति-काल के परम विश्राम-स्थल के रूप में प्रसिद्ध हैं। उन्हीं में समस्त जीव विलीन होते हैं और जाग्रत अवस्था में पुनः उन्हीं से बहिर्गत होते हैं। अग्रिम प्रसंग का अभिप्राय यह है कि नाड़ियाँ सुषुप्ति-स्थल (ब्रह्म) तक पहुँचने के केवल मार्ग अथवा द्वार मात्र हैं। परमात्मा को ही वह परम आधार समझना चाहिए जहाँ सुषुप्त जीव विश्राम करता है और जहाँ से वह पुनः जाग्रत होकर विषयों का उपभोग करने निकलता है। बालाकि और अजातशत्रु के इसी संवाद की वाजसनेयि-शाखा में भी जीव का वर्णन 'विज्ञानमय' कहकर किया गया है और ब्रह्म को उससे स्पष्टतः पृथक् निरूपित किया गया है। उस पाठ में प्रश्न इस प्रकार है: "य एष विज्ञानमयः पुरुषः क्वैष तदाभूत् कुत एतदागात्" (अर्थात् यह जो विज्ञानमय पुरुष है, वह उस समय कहाँ था? और वह कहाँ से आया?) और इसका उत्तर दिया गया है: "य एषोऽन्तर्हृदय आकाशस्तस्मिञ्छेते" (अर्थात् जो यह हृदयाकाश के भीतर परब्रह्म है, उसी में यह शयन करता है)। इस प्रकार, परब्रह्म पुरुषोत्तम ही इस प्रसंग में मुख्य रूप से ज्ञेय तत्व प्रतिपादित हुए हैं।