गोविन्द भाष्य (श्रील बलदेव विद्याभूषण - अचिन्त्यभेदाभेद वेदान्त ब्रह्मसूत्र भाष्य सटीक)
Govinda Bhashya of Baladeva Vidyabhushana with Commentary
श्रील बलदेव विद्याभूषण (संपादक: कृष्णदास बाबा जी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें॥ तैत्तिरीयोपनिषत् (२.५.१) ॥ विज्ञानं ब्रह्म चेद् वेद तस्माच्चेन्न प्रमाद्यति। शरीरे पाप्मनो हित्वा सर्वान् कामान् समश्नुते॥ (अनुवाद:) "यदि कोई शरीर में स्थित उस ब्रह्म के यथार्थ स्वरूप को जान लेता है जो भौतिक जगत् की प्रतीति के लिए शारीरिक इन्द्रियों का प्रयोग करता है, तो ऐसा ब्रह्मविद् कभी प्रमादग्रस्त या मोहग्रस्त नहीं होता। शरीरस्थ ब्रह्म का ऐसा ज्ञाता समस्त पापकर्मों का त्याग कर देता है, तथा मृत्यु के समय शरीर को त्यागकर उस परम पद को प्राप्त करता है जहाँ उसकी समस्त कामनाएँ युगपत् परिपूर्ण हो जाती हैं।" (पूर्वपक्ष एवं सिद्धान्त-अवतरणिका:) यहाँ पूर्वपक्षी यह आक्षेप कर सकता है कि इस प्रकार 'ब्रह्म' शब्द का अर्थ व्यष्टि जीवात्मा ही स्वीकार किया जाना चाहिए। इस मिथ्या धारणा का खण्डन करने हेतु, श्रील व्यासदेव आगामी सूत्र में परब्रह्म के वास्तविक स्वरूप और असाधारण लक्षण का निरूपण करते हैं। ॥ अधिकरणम् २ : जन्माद्यधिकरणम् (सर्वकारणत्व-निरूपणम्) ॥ ॥ ब्रह्मसूत्रम् २ ॥ जन्माद्यस्य यतः ॥ २ ॥ पदच्छेद एवं शब्दार्थ: जन्म-आदि — सृष्टि (उत्पत्ति), स्थिति (पालन) तथा लय (प्रलय); अस्य — इस (प्रत्यक्ष दृश्यमान चतुर्दशभुवनात्मक जगत्) का; यतः — जिससे (जिस परम कारण से सम्पादित होता है)। सूत्रार्थ: परब्रह्म वह परम तत्त्व हैं, जिनसे इस सम्पूर्ण जगत् की उत्पत्ति, स्थिति तथा प्रलय होते हैं।* ॥ श्रील बलदेव विद्याभूषण विरचित गोविन्दभाष्य-तात्पर्यम् ॥ यहाँ 'जन्मादि' पद 'तद्गुणसंविज्ञान-बहुव्रीहि-समास' है, जिसका अर्थ "सृष्टि, स्थिति एवं प्रलय" समझना चाहिए। सूत्र में 'अस्य' पद का अर्थ है — "यह चतुर्दश भुवनात्मक भौतिक जगत्, जिसमें ब्रह्मा से लेकर क्षुद्रतम तृण-गुल्म पर्यन्त विविध योनियों के जीव वास करते हैं, जो सभी अपने-अपने विविध सकाम कर्मों (कर्मफल) के सुख तथा दुःख का भोग करते हैं, तथा जो इस जगत् की आश्चर्यजनक एवं अचिन्त्य रचना को बुद्धि द्वारा समझने में सर्वथा असमर्थ हैं।"