गोविन्द भाष्य (श्रील बलदेव विद्याभूषण - अचिन्त्यभेदाभेद वेदान्त ब्रह्मसूत्र भाष्य सटीक)
Govinda Bhashya of Baladeva Vidyabhushana with Commentary
श्रील बलदेव विद्याभूषण (संपादक: कृष्णदास बाबा जी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएतस्माज्जायते प्राणो मनः सर्वेन्द्रियाणि च। खं वायुर्ज्योतिरापः पृथिवी विश्वस्य धारिणी॥ "उस (परमेश्वर) से प्राण, मन, समस्त इन्द्रियाँ, आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी उत्पन्न होते हैं, जो इस विश्व को धारण करने वाली हैं।" सुबाल उपनिषद् में यह क्रम विपरीत है, जहाँ प्रधान और महत्- तत्त्व सर्वप्रथम आते हैं। वास्तव में सब कुछ श्रीभगवान् (परम पुरुषोत्तम) से ही उत्पन्न होता है। वे प्राण-वायु से आरम्भ कर पृथ्वी पर्यन्त प्रत्येक वस्तु के भीतर विद्यमान रहते हैं; और जब सृष्टि का एक तत्त्व दूसरे तत्त्व से उत्पन्न होता है, तो वह द्वितीय तत्त्व वास्तव में प्रथम तत्त्व के भीतर अन्तर्यामी रूप से स्थित सर्वशक्तिमान् परम पुरुषोत्तम भगवान् से ही उत्पन्न होता है। यदि ऐसा न होता, तो ये दोनों विभिन्न विवरण परस्पर विरोधी सिद्ध होते। परम पुरुषोत्तम भगवान् ही सबके मूल उद्गम और सबके स्रष्टा हैं। उन्हें जान लेने पर सब कुछ ज्ञात हो जाता है। प्रधान तथा प्रकृति के अन्य तत्त्व जड़ एवं अचेतन होने के कारण स्वतः भौतिक जगत् में विकार (परिवर्तन) उत्पन्न नहीं कर सकते। इसी कारण यहाँ 'च' (भी) शब्द का प्रयोग किया गया है। अतः प्रत्येक परिस्थिति में परम पुरुषोत्तम भगवान् ही भौतिक जगत् के इन परिवर्तनों के वास्तविक कारण हैं। अधिकरण ९ परम पुरुषोत्तम भगवान् ही मन और बुद्धि के स्रष्टा हैं श्रील बलदेव विद्याभूषण द्वारा भूमिका अब सूत्रकार (महर्षि वेदव्यास) एक विशिष्ट संशय का निवारण करते हैं। सूत्र १४ अन्तरा विज्ञानमनसी क्रमेण तल्लिङ्गादिति चेन्नाविशेषात् ॥ १४ ॥ अन्तरा — मध्य में; विज्ञान — बुद्धि (ज्ञान); मनसी — और मन; क्रमेण — क्रम से; तत् — उसके; लिङ्गात् — चिह्न (श्रुति-प्रमाण) से; इति चेत् — ऐसा यदि कहा जाए तो; न — नहीं (ऐसा नहीं है); अविशेषात् — अविशेष होने से (कोई भेद न होने के कारण)।