गोविन्द भाष्य (श्रील बलदेव विद्याभूषण - अचिन्त्यभेदाभेद वेदान्त ब्रह्मसूत्र भाष्य सटीक)
Govinda Bhashya of Baladeva Vidyabhushana with Commentary
श्रील बलदेव विद्याभूषण (संपादक: कृष्णदास बाबा जी) द्वारा
पृष्ठ 235, कुल 647 में से
संदर्भ में पढ़ेंएष हि द्रष्टा "आत्मा ही वह पुरुष (चेतन सत्ता) है जो देखता है।" संशय: क्या आत्मा में विद्यमान चेतना नित्य है अथवा अनित्य? पूर्वपक्ष: आत्मा स्वभावतः अचेतन (जड़) है। वह पाषाण के समान है। चेतना तभी उत्पन्न होती है जब आत्मा का मन से संयोग होता है। यह शास्त्रों के इस कथन में देखा जाता है: "मैं सुखपूर्वक सोया। मुझे किसी भी वस्तु का भान नहीं था।" यह कथन सिद्ध करता है कि चेतना आत्मा का स्वाभाविक गुण नहीं है, अपितु अन्य वस्तु (मन) के सम्पर्क से उत्पन्न होती है। यह लोहे और अग्नि के सदृश है। अग्नि में रखने पर लोहे की छड़ धीरे-धीरे अग्नि के गुणों को ग्रहण कर लेती है। यदि चेतना आत्मा का स्वाभाविक गुण होती, तो प्रगाढ़ निद्रा (सुषुप्ति) में इसका लोप नहीं होता। सिद्धान्त: आगामी शब्दों में सूत्रकार (श्रीव्यासदेव) अपना सिद्धान्त प्रस्तुत करते हैं। सूत्र २६ पृथगुपदेशात् पृथक् — पृथक् (भिन्न रूप से); उपदेशात् — उपदेश (कथन) होने के कारण। क्योंकि (ज्ञान और ज्ञाता का) पृथक् उपदेश किया गया है। श्रील बलदेव विद्याभूषण कृत तात्पर्य / भाष्य आत्मा नित्य रूप से चेतन है। यह किस प्रकार जाना जाता है? सूत्र स्पष्ट करता है: "क्योंकि पृथक् उपदेश है।" उस उपदेश के कुछ उदाहरण प्रस्तुत हैं। प्रश्नोपनिषद् (४.९) में कहा गया है: एष हि द्रष्टा "आत्मा नित्य देखता है (नित्य द्रष्टा है)।" बृहदारण्यकोपनिषद् (४.५.१४) में कहा गया है: