भारतकोश
गोविन्द भाष्य (श्रील बलदेव विद्याभूषण - अचिन्त्यभेदाभेद वेदान्त ब्रह्मसूत्र भाष्य सटीक)

गोविन्द भाष्य (श्रील बलदेव विद्याभूषण - अचिन्त्यभेदाभेद वेदान्त ब्रह्मसूत्र भाष्य सटीक)

Govinda Bhashya of Baladeva Vidyabhushana with Commentary

श्रील बलदेव विद्याभूषण (संपादक: कृष्णदास बाबा जी) द्वारा

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अधिकरणम्: अंशाधिकरणम् (वेदान्त-दर्शनम्, अध्याय २, पाद ३) सूत्रम् ४७: असन्ततेश्चाव्यतिकरः ॥ ४७ ॥ पदच्छेदः: असन्ततेः — च — अव्यतिकरः। पदार्थः: असन्ततेः = अपूर्णत्वात् (परिच्छिन्नत्वात्, अणुत्वात् वा) ; च = पुनः, और ; अव्यतिकरः = अव्यवस्था न होना (साङ्कर्य का अभाव, भ्रम-रहित होना)। सूत्रार्थः: जीव के अपूर्ण (अणु तथा परिच्छिन्न) होने के कारण परमेश्वर के साथ उसका कोई साङ्कर्य (अभेद या भ्रमात्मक एकत्व) नहीं हो सकता। श्रील बलदेव विद्याभूषण विरचित गोविन्दभाष्य तात्पर्य: जीवात्मा के अपूर्ण तथा परिच्छिन्न होने के कारण उसे कभी भी परमेश्वर का अवतार समझने का भ्रम नहीं हो सकता। अतः जीवात्माएँ भगवान् के श्री मत्स्य आदि परिपूर्ण अवतारों के समान या उनके सदृश कदापि नहीं हो सकतीं। श्वेताश्वतरोपनिषद् (५.९) में जीवात्मा के स्वरूप एवं परिमाण का वर्णन इस प्रकार किया गया है: श्रुति-प्रमाण (श्वेताश्वतरोपनिषद् ५.९): बालाग्रशतभागस्य शतधा कल्पितस्य च । भागो जीवः स विज्ञेयः स चानन्त्याय कल्पते ॥ हिन्दी अनुवाद: "यदि केश के अग्रभाग के सौ भाग किए जाएँ और फिर उस सौवें भाग के पुनः सौ भाग किए जाएँ, तो उस दश-सहस्रतम (दस हज़ारवें) भाग के बराबर जीवात्मा का सूक्ष्म परिमाण जानना चाहिए।" जीवात्मा के अणु तथा सीमित होने के विपरीत, श्री मत्स्य आदि भगवान् के समस्त अवतार सर्वथा पूर्ण और समग्र हैं, जैसा कि ईशोपनिषद् (तथा बृहदारण्यकोपनिषद् शान्तिमन्त्र) में स्पष्ट किया गया है: श्रुति-प्रमाण (ईशोपनिषद्): ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥ हिन्दी अनुवाद: "परमब्रह्म पूर्ण हैं, यह अवतार रूप भी पूर्ण है; उस पूर्ण से ही यह पूर्ण प्रकट होता है। पूर्ण से पूर्ण को निकाल लेने पर भी पूर्ण ही शेष रहता है।" उत्तर-सूत्र अवतरणिका: अब ग्रन्थकार आगामी सूत्र में जीवात्मा को साक्षात् परब्रह्म के सर्वथा अभिन्न मानने में जो महान् दोष (दार्शनिक असंगति) आता है, उसका निरूपण करते हैं — सूत्रम् ४८