भारतकोश
गोविन्द भाष्य (श्रील बलदेव विद्याभूषण - अचिन्त्यभेदाभेद वेदान्त ब्रह्मसूत्र भाष्य सटीक)

गोविन्द भाष्य (श्रील बलदेव विद्याभूषण - अचिन्त्यभेदाभेद वेदान्त ब्रह्मसूत्र भाष्य सटीक)

Govinda Bhashya of Baladeva Vidyabhushana with Commentary

श्रील बलदेव विद्याभूषण (संपादक: कृष्णदास बाबा जी) द्वारा

DevanagariHindipublished647 पृष्ठ

पृष्ठ 296, कुल 647 में से

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मांसादि भौमं यथाशब्दमितरयोश्च ॥ पदच्छेद एवं शब्दार्थ: मांस — मांस; आदि — इत्यादि; भौमम् — पृथ्वी से उत्पन्न; यथा — जैसा; शब्दम् — श्रुति-शास्त्र; इतरयोः — अन्य दोनों का; च — भी। अनुवाद: जैसा कि श्रुति-शास्त्र कहता है, मांस आदि अवयव पृथ्वी के विकार हैं। अन्य दोनों (जल और तेज) के विषय में भी ऐसा ही समझना चाहिए। श्रील बलदेव विद्याभूषण विरचित गोविन्द-भाष्य (तात्पर्य): मांस आदि शरीर के अवयव पृथ्वी तत्व से बने हैं। रक्त जल से निर्मित है और अस्थियाँ तेज से बनी हैं। यह श्रुति-शास्त्र में वर्णित है (यथा-शब्दम्)। गर्भोपनिषद् में कहा गया है: यत् कठिनं सा पृथिवी यद् द्रवं तद् आपो यद् उष्णं तत् तेजः ॥ श्रुत्यर्थ: "शरीर में जो कठिन (ठोस) भाग है वह पृथ्वी है, जो द्रव रूप है वह जल है, और जो उष्ण (ऊष्मा) है वह तेज है।" इस प्रकार यह सिद्ध होता है कि समस्त भौतिक देह इन तीनों तत्वों के संघात से ही निर्मित हैं। पूर्वपक्ष: यहाँ कोई यह आपत्ति कर सकता है कि यदि सभी भौतिक तत्व त्रिवृत्कृत (परस्पर मिश्रित) हैं और कोई भी तत्व शुद्ध रूप में नहीं है, अपितु सभी तीनों तत्वों के सम्मिश्रण हैं, तो शास्त्र यह क्यों कहते हैं कि "शरीर का यह भाग तेज से बना है, यह भाग जल से बना है और यह भाग पृथ्वी से बना है"? सिद्धान्त: इस आक्षेप का निराकरण करते हुए सूत्रकार निम्नलिखित उत्तर प्रस्तुत करते हैं: सूत्र २२ वैशेषात्तु तद्वादस्तद्वादः ॥ पदच्छेद एवं शब्दार्थ: वैशेषात् — विशेष भाव (तत्व के आधिक्य) के कारण; तु — किन्तु (आशङ्का-निवारणार्थ); तत् — उस रूप; वादः — कथन या व्यवहार; तत् — उस रूप; वादः — कथन (द्विरुक्ति पाद-समाप्ति सूचक है)। अनुवाद: किसी विशेष तत्व की अधिकता होने के कारण ही वैसा व्यपदेश (कथन/नामकरण) किया जाता है। विशेष भाव होने से ही वैसा कहा गया है। श्रील बलदेव विद्याभूषण विरचित गोविन्द-भाष्य (तात्पर्य)

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