भारतकोश
गोविन्द भाष्य (श्रील बलदेव विद्याभूषण - अचिन्त्यभेदाभेद वेदान्त ब्रह्मसूत्र भाष्य सटीक)

गोविन्द भाष्य (श्रील बलदेव विद्याभूषण - अचिन्त्यभेदाभेद वेदान्त ब्रह्मसूत्र भाष्य सटीक)

Govinda Bhashya of Baladeva Vidyabhushana with Commentary

श्रील बलदेव विद्याभूषण (संपादक: कृष्णदास बाबा जी) द्वारा

DevanagariHindipublished647 पृष्ठ

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पृष्ठ 309

सूत्र १२ सुकृतदुष्कृते एवेति तु बादरिः ॥ ३।१।१२ ॥ पदच्छेद एवं शब्दार्थ: सुकृत — पुण्य कर्म; दुष्कृते — पाप कर्म; एव — ही / वस्तुतः; इति — इस प्रकार; तु — किन्तु / परन्तु; बादरिः — बादरि मुनि। सूत्रार्थ: किन्तु बादरि मुनि का विचार है कि ('चरण' शब्द से) पुण्य और पाप कर्म ही अभिप्रेत हैं। श्रील बलदेव विद्याभूषण विरचित गोविन्दभाष्य तात्पर्य: यहाँ 'तु' शब्द पूर्वपक्ष का निराकरण करने के लिए प्रयुक्त हुआ है। आचार्य बादरि का विचार है कि यहाँ 'चरण' शब्द का तात्पर्य 'पुण्य और पाप कर्म' ही है। इसका दृष्टान्त इस वाक्य में मिलता है: पुण्यं कर्माचरति अर्थात् "वह पुण्य कर्म का अनुष्ठान करता है।" इस वाक्य में 'आचरति' क्रिया का प्रयोग 'कर्म करने' के अर्थ में ही हुआ है। यदि किसी शब्द का मुख्य (प्राथमिक) अर्थ सम्भव हो, तो गौण अर्थ को स्वीकार करना न्यायसंगत नहीं होता। अतः यहाँ 'चरण' शब्द का अर्थ 'कर्म' ही है, तथा इसके अतिरिक्त अन्य कोई व्याख्या निरर्थक है। 'चरण' (सदाचार) वस्तुतः कर्म का ही एक विशिष्ट प्रकार है। चरण और कर्म में भेद केवल उसी प्रकार है जैसे कुरुओं और पाण्डवों में (ब्राह्मण-परिव्राजक न्यायवत्)। सूत्र में प्रयुक्त 'एव' (ही) शब्द यह संकेत करता है कि यह मत स्वयं सूत्रकार (श्री वेदव्यास जी) का भी अभीष्ट मत है। अतः चूँकि 'चरण' कर्म का ही एक विशेष प्रकार है, यह सिद्ध होता है कि स्वर्गलोक से अवरोहण करने वाला जीव अपने अवशिष्ट कर्मों (अनुशय) से युक्त होकर ही लौटता है। अधिकरण ३ अनिष्ठादिकार्यधिकरणम्: क्या पापी जीव भी चन्द्रलोक को जाते हैं?