भारतकोश
गोविन्द भाष्य (श्रील बलदेव विद्याभूषण - अचिन्त्यभेदाभेद वेदान्त ब्रह्मसूत्र भाष्य सटीक)

गोविन्द भाष्य (श्रील बलदेव विद्याभूषण - अचिन्त्यभेदाभेद वेदान्त ब्रह्मसूत्र भाष्य सटीक)

Govinda Bhashya of Baladeva Vidyabhushana with Commentary

श्रील बलदेव विद्याभूषण (संपादक: कृष्णदास बाबा जी) द्वारा

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॥ श्रीब्रह्मसूत्रम् ॥ तृतीयाध्यायः — प्रथमः पादः अधिकरणम् — संयमनाधिकरणम् श्रुति-उद्धरणम् (कौषीतकि-उपनिषद् १.२): ये वै के चास्माल्लोकात्प्रयान्ति चन्द्रमसमेव ते सर्वे गच्छन्ति। श्रुति-अनुवाद: "इस लोक से जो कोई भी प्रयाण करते हैं, वे सभी अवश्य ही चन्द्रलोक को जाते हैं।" पूर्वपक्षः इस श्रुति-वचन द्वारा शास्त्र यह प्रतिपादित करता है कि बिना किसी भेद के 'सभी' जीव चन्द्रलोक को जाते हैं। अतः पापी जन भी उस 'सभी' शब्द के अन्तर्गत ही संगृहीत होते हैं। ऐसा होने पर, ईशोपनिषद् आदि के वचन पापियों को दुष्कर्मों से विरत करने हेतु केवल भय दिखाने मात्र हैं। वस्तुतः पुण्यात्मा और पापात्मा दोनों ही एक समान फल को प्राप्त करते हैं। सिद्धान्तः अत्रोच्यते—नैतदेवम्, पापी कभी भी सुख का अनुभव नहीं करता। इस विषय में सूत्रकार व्यासदेव अपना सिद्धान्त-वचन प्रस्तुत करते हैं: ब्रह्मसूत्रम् (सूत्र १४): संयमने त्वनुभूयेतरेषामारोहावरोहौ तद्गतिदर्शनात् ॥ १४ ॥ पदच्छेदः संयमने, तु, अनुभूय, इतरेषाम्, आरोहावरोहौ, तद्गतिदर्शनात्। शब्दार्थः संयमने = यमराज की संयमनी नगरी में; तु = किन्तु (पूर्वपक्ष के निवारणार्थ); अनुभूय = यातना का अनुभव (भोग) करके; इतरेषाम् = अन्यों का (जिन्होंने इष्टादि पुण्यकर्म नहीं किए हैं अर्थात् पापियों का); आरोहावरोहौ = ऊपर जाना और पुनः नीचे आना (आरोह और अवरोह); तद्गतिदर्शनात् = श्रुति-शास्त्र में उनकी ऐसी ही गति का वर्णन देखे जाने से। सूत्रार्थः किन्तु जो पुण्यकर्मी से इतर (पापी) हैं, वे संयमनी (यमलोक) में जाकर दण्ड भोगकर पुनः नीचे लौटते हैं, क्योंकि श्रुति में उनकी इसी प्रकार की गति का दर्शन होता है। श्रील बलदेव विद्याभूषण विरचित गोविन्दभाष्यम् (तात्पर्य): यहाँ 'तु' शब्द पूर्वपक्ष के निराकरण और खण्डन के लिए प्रयुक्त हुआ है। 'इतरेषाम्' पद का अर्थ है—वे अज्ञानी जीव जिन्होंने इष्टापूर्त आदि धर्म-कर्मों का आचरण नहीं किया। 'संयमने' पद का अभिप्राय यमराज की संयमनी नामक पुरी से है। पापी जीव उसी संयमनी में जाते हैं, जहाँ यमराज द्वारा उन्हें दण्डित किया जाता है और तदुपरान्त वे पुनः भूलोक में फेंक दिए जाते हैं। उनका गमन और आगमन इसी व्यवस्था के अन्तर्गत होता है। सूत्रकार हेतु प्रस्तुत करते हैं—'तद्गतिदर्शनात्' अर्थात् श्रुति-शास्त्र में उनकी ऐसी ही गति का निरूपण मिलता है। जैसा कि कठोपनिषद् (१.२.६) में यमराज नचिकेता से कहते हैं: उपनिषद्-श्रुति (कठोपनिषद् १.२.६): न साम्परायः प्रतिभाति बालं प्रमाद्यन्तं वित्तमोहेन मूढम्। अयं लोको नास्ति पर इति मानी पुनः पुनर्वशमापद्यते मे॥ श्रुति-हिन्दी-व्याख्या: धन के मोह से मूढ़ और प्रमादग्रस्त अविवेकी मनुष्य को परलोक का साधन (तत्त्व-ज्ञान) कभी प्रतिभासित नहीं होता। 'यही लोक सत्य है, परलोक कुछ नहीं है'—ऐसा मानने वाला पुरुष बारम्बार मेरे (मृत्यु अर्थात् यमराज के) वश में आता है। उपसंहार: अतः यह सिद्ध हुआ कि चन्द्रलोक केवल सकाम पुण्यकर्मियों के लिए है, पापी जन संयमनी जाकर यातना भोगकर सीधे अधोलोक को प्राप्त होते हैं।