गोविन्द भाष्य (श्रील बलदेव विद्याभूषण - अचिन्त्यभेदाभेद वेदान्त ब्रह्मसूत्र भाष्य सटीक)
Govinda Bhashya of Baladeva Vidyabhushana with Commentary
श्रील बलदेव विद्याभूषण (संपादक: कृष्णदास बाबा जी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअभिव्यक्त होता है)। इसका अर्थ है: "क्योंकि वे सभी के द्वारा नहीं देखे जाते"। इस प्रकार यह सिद्ध होता है कि परमात्मा ही स्वप्न में दृष्टिगोचर होने वाली सृष्टि के परम स्रष्टा हैं। ॥ अधिकरण २ ॥ (सभी स्वप्न मिथ्या या मायामात्र नहीं हैं) श्रील बलदेव विद्याभूषण द्वारा अवतरणिका: संशय: क्या स्वप्न सत्य हैं अथवा केवल भ्रम (माया)? पूर्वपक्ष: जब कोई व्यक्ति जाग्रत् अवस्था में आता है, तो वह तत्काल अनुभव करता है कि जो कुछ उसने स्वप्न में देखा वह मिथ्या था। अतः समस्त स्वप्न केवल भ्रम ही हैं। सिद्धान्त: इसके समाधान में सूत्रकार भगवान् बादरायण अपना निर्णय व्यक्त करते हैं— ॥ सूत्र ४ ॥ सूचकश्च हि श्रुतेराचक्षते च तद्विदः ॥ ४ ॥ पदच्छेद एवं शब्दार्थ: सूचकः — भावी शुभाशुभ का ज्ञापक; च — और; हि — निश्चय ही; श्रुतेः — श्रुति-प्रमाण से; आचक्षते — निरूपण करते हैं; च — तथा; तद्विदः — उस स्वप्न-विज्ञान को जानने वाले विशेषज्ञ। सूत्रार्थ: स्वप्न भावी फल का सूचक होता है; क्योंकि श्रुति ऐसा प्रतिपादित करती है और स्वप्न-शास्त्र के ज्ञाता भी यही कहते हैं। श्रील बलदेव विद्याभूषण कृत गोविन्द-भाष्य: स्वप्न शुभ और अशुभ भविष्य के सूचक होते हैं। वे मन्त्र, औषधि तथा अन्य गूढ़ विषयों को भी प्रकट करते हैं। अतः स्वप्न सर्वथा मिथ्या नहीं अपितु सत्य हैं। स्वप्न इन विषयों को किस प्रमाण से प्रकट करते हैं? सूत्र में कहा गया है: "श्रुतेः" (क्योंकि श्रुति-शास्त्र इसका विधान करता है)। छान्दोग्योपनिषद् (५.२.९) में कहा गया है: यदा कर्मसु काम्येषु स्त्रियं स्वप्नेऽभिपश्यति। समृद्धिं तत्र जानीयात् तस्मिन् स्वप्ननिदर्शने ॥