भारतकोश
गोविन्द भाष्य (श्रील बलदेव विद्याभूषण - अचिन्त्यभेदाभेद वेदान्त ब्रह्मसूत्र भाष्य सटीक)

गोविन्द भाष्य (श्रील बलदेव विद्याभूषण - अचिन्त्यभेदाभेद वेदान्त ब्रह्मसूत्र भाष्य सटीक)

Govinda Bhashya of Baladeva Vidyabhushana with Commentary

श्रील बलदेव विद्याभूषण (संपादक: कृष्णदास बाबा जी) द्वारा

DevanagariHindipublished647 पृष्ठ

पृष्ठ 336, कुल 647 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 336

...परमेश्वर का निराकरण होता है। ऐसा नहीं है। अतः जीवात्मा परमेश्वर-रूपी शय्या पर ही शयन करता है। ॥ पञ्चममधिकरणम् ॥ (उसी जीव का शरीर में पुनः प्रत्यागमन) श्रील बलदेव विद्याभूषण कृत उपोद्घात (भूमिका): छान्दोग्योपनिषद् में कहा गया है— "सत आगम्य न विदुः सतः आगच्छामह इति" (सतः चागत्य न विदुः) "हम परमेश्वर से ही लौटकर आते हैं, किन्तु यह नहीं जान पाते कि हम परमेश्वर से ही आए हैं।" संशय: परमेश्वर-रूपी शय्या से जाग्रत् होने वाला व्यक्ति क्या वही है जो पहले वहाँ सुप्त हुआ था, अथवा कोई अन्य व्यक्ति है? पूर्वपक्ष: परमेश्वर को प्राप्त करने के पश्चात् जीव का पुनः उसी भौतिक शरीर में लौटना सम्भव नहीं है। अतः जो जागता है, वह अवश्य ही कोई भिन्न जीव होना चाहिए। सिद्धान्त: सूत्रकार महर्षि व्यास निम्नलिखित सूत्र द्वारा अपना निर्णय प्रस्तुत करते हैं— ॥ ब्रह्मसूत्रम् ३।२।९ ॥ स एव तु कर्मानुस्मृतिशब्दविधिभ्यः ॥ ३।२।९ ॥ पदच्छेद एवं शब्दार्थ: सः — वह (वही पूर्व सुप्त जीव); एव — ही; तु — किन्तु / निश्चय ही; कर्म — अवशिष्ट कर्मों के कारण; अनुस्मृति — पूर्ववृत्तान्त के स्मरण (पहचान) के कारण; शब्द — श्रुति-वाक्यों के प्रमाण से; विधिभ्यः — शास्त्रोक्त विधियों (कर्मकाण्ड एवं मोक्ष-साधनों के विधान) के कारण। अनुवाद एवं तात्पर्य: वह पूर्व में सुप्त हुआ जीव ही पुनः जागकर अपने शरीर में लौटता है, कोई अन्य नहीं; क्योंकि अवशिष्ट कर्मों के भोग, पूर्व अनुस्मृति (स्मरण), श्रुति-शब्द के प्रमाण तथा शास्त्र-विधि के औचित्य से यही सिद्ध होता है।