गोविन्द भाष्य (श्रील बलदेव विद्याभूषण - अचिन्त्यभेदाभेद वेदान्त ब्रह्मसूत्र भाष्य सटीक)
Govinda Bhashya of Baladeva Vidyabhushana with Commentary
श्रील बलदेव विद्याभूषण (संपादक: कृष्णदास बाबा जी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें"पादोऽस्य सर्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि।" "समग्र जड़-प्रपञ्च उस परमेश्वर का केवल एक पाद (चरण) मात्र है।" यह सम्यक् बोध होने पर कि यह सम्पूर्ण जड़ जगत् परमेश्वर का केवल एक ही पाद है, साधक किसी से भी द्वेष नहीं करता, और तदनन्तर उसका हृदय श्रीभगवान् के प्रति अनन्य प्रेम-भक्ति में समर्पित हो जाता है। तथापि इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि मनुष्य प्रत्येक वस्तु में आसक्त हो जाए, क्योंकि ऐसा करने से बुद्धि मोहग्रस्त हो जाती है। ॥ अधिकरणम् १६ ॥ परमेश्वरस्य वैचित्र्यविशिष्टत्वम् (भगवान् वैचित्र्य-विहीन नहीं हैं) श्रीमद्-बलदेव-विद्याभूषण-विरचिता भूमिका (गोविन्दभाष्य-अवतरणिका): अथ नानाविधप्रेमानुरूपं भजनीयस्य नानाविधत्वं दर्शयति— अब यह तथ्य प्रतिपादित किया जाता है कि भगवान् के प्रति भक्तों के नानाविध प्रेम और भाव-वैचित्र्य के अनुरूप ही, उपास्य परमेश्वर श्रीहरि भी अनेक प्रकार के दिव्य विग्रहों (स्वरूपों) को स्वीकार करते हैं। यदि ऐसा न हो, तो भक्तों के नानाविध प्रेम-वैविध्य का प्रयोजन ही व्यर्थ सिद्ध होगा। भगवान् के ये अनन्त रूप अनादि एवं नित्य हैं। जैसा कि श्रुति-शास्त्र में वर्णित है: "एकोऽपि सन् बहुधा योऽवभाति" (यद्यपि वे एक ही हैं, तथापि वे अनेक रूपों में प्रकाशित होते हैं।) इस प्रकार, वे एक ही अद्वितीय परमपुरुष नित्य रूप से विभिन्न धामों एवं रूपों में युगपत् आविर्भूत रहते हैं। संशयः (सन्देह)—किं तेषु रूपेषु तारतम्यं (न्यूनाधिकभावः) अस्ति न वेति? संशय (हिन्दी)—क्या भगवान् के इन विभिन्न स्वरूपों में परस्पर कोई उच्च-नीच अथवा न्यूनाधिक भेद का तारतम्य है अथवा नहीं? पूर्वपक्षः—सर्वसाम्यात् परमात्मस्वरूपाणां परस्परं तारतम्यं नास्तीति। पूर्वपक्ष (हिन्दी)—चूँकि ये समस्त स्वरूप एक ही पूर्णब्रह्म परमेश्वर के हैं, अतः वे सभी सर्वथा समान हैं और उनमें कोई भेद या तारतम्य नहीं है। सिद्धान्तः—अत्रोच्यते, सूत्रकारः स्वसिद्धान्तं प्रकटयति— सिद्धान्त (हिन्दी)—इसके उत्तर में सूत्रकार महर्षि बादरायण निम्नलिखित शब्दों द्वारा अपने सिद्धान्त का प्रतिपादन करते हैं: ॥ सूत्रम् ३५ ॥ उपपत्तेश्च ॥ ३५ ॥