गोविन्द भाष्य (श्रील बलदेव विद्याभूषण - अचिन्त्यभेदाभेद वेदान्त ब्रह्मसूत्र भाष्य सटीक)
Govinda Bhashya of Baladeva Vidyabhushana with Commentary
श्रील बलदेव विद्याभूषण (संपादक: कृष्णदास बाबा जी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसंशयः — क्या स्वर्गलोक-प्राप्ति आदि पुण्य-फल यज्ञादि कर्मों के अनुष्ठान से स्वतः प्राप्त होते हैं, अथवा वे परमेश्वर के विधान (स्वीकृति) द्वारा प्राप्त होते हैं? पूर्वपक्षः — ये समस्त फल यज्ञादि कर्मों के सम्पादन से ही उत्पन्न होते हैं; इसमें परमेश्वर की कोई भूमिका नहीं है। सिद्धान्तः — इसके समाधान में सूत्रकार भगवान् बादरायण अपना निश्चित मत (सिद्धान्त) प्रस्तुत करते हैं—
सूत्र ३९
फलमत उपपत्तेः ॥ ३९ ॥ पदच्छेदः एवं शब्दार्थः फलम् — कर्मफल; अतः — उस परमेश्वर से ही; उपपत्तेः — क्योंकि यही युक्तिसंगत (उपपन्न) है। सूत्रार्थः कर्मों का फल उस परमेश्वर से ही प्राप्त होता है, क्योंकि यही युक्तियुक्त है। श्रील बलदेव विद्याभूषण विरचित गोविन्दभाष्य (तात्पर्य) स्वर्गलोक की प्राप्ति तथा अन्य पुण्य-फल, जो यज्ञादि सद्धर्मों के अनुष्ठान से साध्य हैं, वस्तुतः स्वयं परमेश्वर द्वारा ही प्रदान किए जाते हैं। ऐसा क्यों? इस पर सूत्रकार कहते हैं—"उपपत्तेः" (क्योंकि यही तर्कसंगत है)। नित्य, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान् एवं परम उदार परमेश्वर की जब यज्ञादि कर्मों द्वारा आराधना की जाती है, तब वे ही कालान्तर में उन सत्कर्मों का अभीष्ट फल प्रदान करते हैं। कर्म तो स्वतः अचेतन (जड़) हैं तथा उत्पन्न होकर क्षणमात्र में विनष्ट हो जाते हैं; अतः वे विनष्ट होकर कालान्तरभावी फल देने में असमर्थ हैं। यही इसका तात्पर्य है। अग्रिम सूत्र में सूत्रकार इसका श्रुति-प्रमाण प्रस्तुत करते हैं—
सूत्र ४०
श्रुतत्वाच्च ॥ ४० ॥ पदच्छेदः एवं शब्दार्थः श्रुतत्वात् — श्रुति-शास्त्र में ऐसा ही प्रतिपादित होने के कारण; च — तथा / भी। सूत्रार्थः तथा श्रुति-शास्त्र द्वारा प्रमाणित होने के कारण भी (वही फलदाता सिद्ध होते हैं)।