गोविन्द भाष्य (श्रील बलदेव विद्याभूषण - अचिन्त्यभेदाभेद वेदान्त ब्रह्मसूत्र भाष्य सटीक)
Govinda Bhashya of Baladeva Vidyabhushana with Commentary
श्रील बलदेव विद्याभूषण (संपादक: कृष्णदास बाबा जी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअधिकरणम् — आनन्दमयाधिकरणम् (वेदान्तसूत्रम् १.१.१२-१९) पूर्वपक्षः — अत्र कश्चिद् आशङ्केत — तैत्तिरीयोपनिषदि (२.२.३) श्रूयते — «अन्योऽन्तर आत्मा प्राणमयः» इति । तत्र अचेतने जडेऽपि आत्मशब्दः प्रयुक्तः, जीवे चापि प्रयुज्यते । तथा तैत्तिरीयोपनिषदि (२.५.१) पठ्यते — «अन्योऽन्तर आत्मानन्दमयः» इति । तदेवं जडाजडपुरुषेषु आत्मशब्दस्य प्रयुक्तत्वात् कथं नाम अयं सर्वव्यापिनं सर्वज्ञं परं ब्रह्मैव प्रतिपादयतीति निश्चीयेत ? पूर्वपक्ष-भाषानुवादः — यहाँ कोई शङ्का कर सकता है कि तैत्तिरीय उपनिषद् (२.२.३) में कहा गया है — «अन्योऽन्तर आत्मा प्राणमयः» (इसके भीतर दूसरा आत्मा प्राणमय है) । यहाँ 'आत्मा' शब्द का प्रयोग जड़ तत्त्व के लिए हुआ है और इसका प्रयोग व्यष्टि जीवात्माओं के लिए भी होता है । उसी प्रकार तैत्तिरीय उपनिषद् (२.५.१) में कहा गया है — «अन्योऽन्तर आत्मानन्दमयः» (इसके भीतर दूसरा आत्मा आनन्दमय है) । जब 'आत्मा' शब्द इस प्रकार विभिन्न पुरुषों (अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय आदि) के लिए प्रयुक्त हुआ है, तो यह कैसे कहा जा सकता है कि यहाँ 'आत्मा' शब्द सर्वव्यापी, सर्वज्ञ परम पुरुष भगवान् का ही वाचक है ? सिद्धान्तभाष्यम् — अत्रोच्यते — अत्र 'आत्मा' इति शब्दः सर्वव्यापिनं सर्वज्ञं परमपुरुषमेवाभिधत्ते । यतः शास्त्रेषु अन्यत्र बहुषु स्थलेषु अयमेव शब्दः परमपुरुषे रूढः प्रसिद्धश्च दृश्यते । यथा च श्रुतिशास्त्रे (ऐतरेयोपनिषदि १.१.१) उक्तम् — «आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीत्» इति । सिद्धान्त-भाषानुवादः — इसके उत्तर में कहते हैं — यहाँ 'आत्मा' शब्द का अर्थ सर्वव्यापी, सर्वज्ञ परमेश्वर (परब्रह्म) ही है । ऐसा इसलिए है क्योंकि शास्त्र के अन्य अनेक स्थलों पर इस शब्द का प्रयोग इसी अर्थ में किया गया है । उदाहरणार्थ, श्रुतिशास्त्र में कहा गया है — «आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीत्» (सृष्टि के प्रारम्भ में केवल एक अद्वितीय परमेश्वर ही विद्यमान थे) । हेतुविचारः (उत्तरात्) — कथमत्र 'आत्मा' शब्दः परमपुरुषपरक एव ज्ञायते ? सूत्रकारः स्पष्टयति — 'उत्तरात्' (उत्तरवाक्यपर्यालोचनात्) । अस्य पक्षिणः (आनन्दमयस्य रूपकस्य) वर्णनानन्तरं तैत्तिरीयोपनिषदि (२.६.२) इदं वचनमाम्नायते — «सोऽकामयत । बहु स्यां प्रजायेयेति ।» हेतु-भाषानुवादः — यहाँ 'आत्मा' शब्द भगवान् का ही वाचक क्यों है ? सूत्रकार स्पष्ट करते हैं — 'उत्तरात्' (परवर्ती प्रसंग के कारण) । पक्षी-रूपक के वर्णन के पश्चात् तैत्तिरीय उपनिषद् (२.६.२) में यह वचन आता है — «सोऽकामयत बहु स्यां प्रजायेयेति» (उस परमेश्वर ने सङ्कल्प किया कि मैं बहुत हो जाऊँ, मैं विविध रूपों में प्रकट होऊँ) । निष्कर्षः एवं उपसंहारः — अतः पक्षिरूपकानन्तरं समाम्नातम् इदं वाक्यं दृढं प्रमाणीकरोति यद् आनन्दमयः पक्षी साक्षात् परमपुरुषः परब्रह्मैव, न त्वन्यः कश्चित् । तस्मात् पक्षिरूपके वर्णितः आत्मा परमेश्वराद् भिन्नो भवितुं नार्हति । अतएव तस्य पक्षिरूपकस्य प्रयोजनं परमेश्वरस्यैव उपासनार्थं ध्यानसौकर्यार्थं च वर्तते । एतदेव समुचितं समीचीनं च व्याख्यानमिति सिद्धम् । निष्कर्ष-भाषानुवादः — अतएव पक्षी के रूपक के बाद आने वाला यह वाक्य सिद्ध करता है कि उस वर्णन में उल्लिखित आनन्दमय पक्षी निश्चित रूप से परमेश्वर ही हैं । इस प्रकार यह सम्भव नहीं है कि उस रूपक का पक्षी परमेश्वर न हो । इसलिए उस रूपक का प्रयोजन केवल परमेश्वर के ध्यान तथा उपासना में सहायता प्रदान करना है । यही इसकी सर्वथा युक्तिसङ्गत एवं यथार्थ व्याख्या है ।