भारतकोश
गोविन्द भाष्य (श्रील बलदेव विद्याभूषण - अचिन्त्यभेदाभेद वेदान्त ब्रह्मसूत्र भाष्य सटीक)

गोविन्द भाष्य (श्रील बलदेव विद्याभूषण - अचिन्त्यभेदाभेद वेदान्त ब्रह्मसूत्र भाष्य सटीक)

Govinda Bhashya of Baladeva Vidyabhushana with Commentary

श्रील बलदेव विद्याभूषण (संपादक: कृष्णदास बाबा जी) द्वारा

DevanagariHindipublished647 पृष्ठ

पृष्ठ 417, कुल 647 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 417

सिद्धान्तः (निष्कर्षः) निम्नलिखित शब्दों में सूत्रकार अपना सिद्धान्त प्रस्तुत करते हैं — सूत्र २६ वेधाद्यर्थभेदात् ॥ २६ ॥ पदच्छेदः एवं पदार्थः — वेध — छेदन, विदारण अथवा हिंसन; आदि — इत्यादि कर्म; अर्थ — फल; भेदात् — भिन्न होने के कारण। सूत्रार्थः — फल का भेद होने के कारण (भगवदुपासना में) छेदन-विदारण आदि आभिचारिक/हिंसक भावों का ग्रहण नहीं होता। श्रील बलदेव विद्याभूषण विरचित गोविन्दभाष्यम् — अत्र 'न' इति अनुवर्तते। भगवदुपासने शत्रूणां वेध-विदारणादिकं न ग्राह्यम्। कुतः? 'अर्थभेदात्'। अर्थ्यते प्रार्थ्यत इत्यर्थः फलम्, तस्य भेदात्। आभिचारिकमन्त्राणां फलं हि शत्रुवधादिकं हिंसालक्षणम्, भगवदुपासनायास्तु फलं भगवत्प्रीतिलक्षणं कैङ्कर्यम्। साधवः खलु हिंसादि-दोषान् विहाय भगवन्तं भजन्ते। तथा चोक्तं भगवता (भगवद्गीता १३।८) — अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम् । आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः ॥ "मानशून्यता, दम्भहीनता, अहिंसा, क्षमाशीलता, सरलता... यह सब ज्ञान कहा जाता है।" तथा श्रीमद्भागवतेऽपि भगवद्वचनम् (श्रीमद्भागवतम् ११।१०।४) — निवृत्तं कर्म सेवेत प्रवृत्तं मत्परस्त्यजेत् । जिज्ञासायां संप्रवृत्तो नाद्रियेत् कर्मचोदनाम् ॥ "मेरे परायण भक्त को चाहिए कि वह काम्य/सकाम (प्रवृत्त) कर्मों का सर्वथा त्याग करे तथा निष्काम (निवृत्त) धर्म का ही आचरण करे।" भावार्थ (हिन्दी अनुवाद) — इस सूत्र में पूर्वसूत्र से 'न' की अनुवृत्ति समझनी चाहिए। उपासक को चाहिए कि वह भगवान् का चिन्तन दूसरों को काटने, मारने अथवा दण्ड देने वाले हिंसक रूप में न करे। ऐसा क्यों? क्योंकि सूत्र कहता है — 'अर्थभेदात्' अर्थात् फल में भिन्नता होने के कारण। यहाँ 'अर्थ' शब्द का तात्पर्य 'फल' से है। शुद्ध भक्त हिंसा तथा अन्य तामसिक प्रवृत्तियों का परित्याग करते हैं; अतः अभिचार-सम्बन्धी वेधनादि मन्त्रों का उपासना में समावेश नहीं हो सकता।