भारतकोश
गोविन्द भाष्य (श्रील बलदेव विद्याभूषण - अचिन्त्यभेदाभेद वेदान्त ब्रह्मसूत्र भाष्य सटीक)

गोविन्द भाष्य (श्रील बलदेव विद्याभूषण - अचिन्त्यभेदाभेद वेदान्त ब्रह्मसूत्र भाष्य सटीक)

Govinda Bhashya of Baladeva Vidyabhushana with Commentary

श्रील बलदेव विद्याभूषण (संपादक: कृष्णदास बाबा जी) द्वारा

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प्रकृत्या सहितः श्यामः . . . "कुण्डलों और मणियों के हार से विभूषित, श्यामवर्ण, पीतवस्त्रधारी, मस्तक पर जटाजूट धारण किये हुए, शान्त स्वरूप द्विभुज भगवान् राम भगवती सीता के सहित विराजमान हैं।" बृहदारण्यक उपनिषद् (४.४.२२) में कहा गया है: स वा अयमात्मा सर्वस्य वशी सर्वस्येशानः। "वह यह परमात्मा ही सबका नियन्ता, सबका स्वामी और सबका वशी है।" भगवान् के माधुर्य का ध्यान करने से भगवान् की प्राप्ति होती है। यह मार्ग 'रुचि-भक्ति' (रागानुगा भक्ति का मार्ग) कहलाता है। भगवान् के ऐश्वर्य तथा महिमा का ध्यान करने से भी भगवान् की प्राप्ति होती है। यह मार्ग 'विधि-भक्ति' (विधि-विधानों एवं नियमों के अनुशीलन का मार्ग) कहलाता है। संशय: इन दोनों प्रकार के ध्यानों में से कौन-सा श्रेष्ठ है? पूर्वपक्ष: चूँकि इन दोनों प्रकार के ध्यानों का फल अनिश्चित है, अतः किसी को भी इनमें से किसी एक के भी अनुष्ठान की इच्छा नहीं करनी चाहिए। सिद्धान्त: निम्नलिखित वचनों में सूत्रकार (भगवान् बादरायण) अपना सिद्धान्त प्रतिपादित करते हैं— सूत्र २९ छन्दत उभयाविरोधात् ॥ २९ ॥ छन्दतः — स्वेच्छा से; उभय — दोनों में; अविरोधात् — विरोध का अभाव होने से / कोई विरोध न होने के कारण। भगवदिच्छा से (ऐसा नहीं है), क्योंकि इन दोनों में कोई विरोध नहीं है। श्रील बलदेव विद्याभूषण विरचित गोविन्दभाष्य तात्पर्य जिस प्रकार मेंढक दूर से कूदता है (मण्डूकप्लुति न्याय से), उसी प्रकार सूत्र २२ से 'न' पद की इस सूत्र में अनुवृत्ति लानी चाहिए। यहाँ 'छन्दतः' शब्द का अर्थ है, "परमेश्वर की...