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गोविन्द भाष्य (श्रील बलदेव विद्याभूषण - अचिन्त्यभेदाभेद वेदान्त ब्रह्मसूत्र भाष्य सटीक)

गोविन्द भाष्य (श्रील बलदेव विद्याभूषण - अचिन्त्यभेदाभेद वेदान्त ब्रह्मसूत्र भाष्य सटीक)

Govinda Bhashya of Baladeva Vidyabhushana with Commentary

श्रील बलदेव विद्याभूषण (संपादक: कृष्णदास बाबा जी) द्वारा

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श्रील बलदेव विद्याभूषण विरचित भूमिका विषयः अब सूत्रकार यह दर्शाते हैं कि भक्ति दो प्रकार की होती है—एकाङ्गी और अनेकाङ्गी। अथर्ववेदीय गोपालतापनी उपनिषद् के प्रथम अध्याय में अष्टादशाक्षर-मन्त्र का निरूपण करते हुए कहा गया है (१.६)— यो ध्यायति रसयति भजति सोऽमृतो भवति ॥ "जो परमेश्वर का ध्यान करता है, उनका रस-आस्वादन (कीर्तन/गुणगान) करता है तथा उनका भजन करता है, वह अमृत (मुक्त) हो जाता है।" संशयः क्या इन तीनों में से किसी एक ही अङ्ग के अनुष्ठान से मुक्ति प्राप्त हो सकती है, अथवा इन तीनों का एक साथ अनुष्ठान करना अनिवार्य है? पूर्वपक्षः उपनिषद् इन तीनों का नामोल्लेख करती है और उनके उपरान्त कहती है कि साधक अमृत हो जाता है। अतः मुक्ति प्राप्त करने के लिए तीनों का ही अनुष्ठान अनिवार्य है। सिद्धान्तः इस विषय में सूत्रकार निम्नलिखित शब्दों में अपना सिद्धान्त प्रतिपादित करते हैं— सूत्र ३२ अनियमः सर्वेषामविरोधाच्छब्दानुमानाभ्याम् ॥ ३२ ॥ पदार्थः अनियमः — कोई नियम (बाध्यता) नहीं है; सर्वेषाम् — सभी के (एकत्र अनुष्ठान का); अविरोधात् — क्योंकि विरोध का अभाव है; शब्दानुमानाभ्याम् — श्रुति और स्मृति के प्रमाणों से। अनुवाद: उन सभी के एकत्र अनुष्ठान का कोई निश्चित नियम नहीं है, क्योंकि श्रुति-शास्त्र और स्मृति-शास्त्र के वचनों से इसमें कोई विरोध नहीं है। श्रील बलदेव विद्याभूषण विरचित गोविन्दभाष्य ऐसा कोई नियम नहीं है कि मुक्ति-लाभ के लिए ध्यान, रस-आस्वादन (कीर्तन) तथा भजन—इन तीनों का ही अनुष्ठान किया जाए। इनमें से किसी एक का भी अनुष्ठान मुक्ति प्रदान करने में समर्थ है। ऐसा क्यों? सूत्र कहता है—"शब्दानुमानाभ्याम्"। इसका अभिप्राय है—"श्रुति और स्मृति के साथ कोई विरोध न होने के कारण।" आगे चलकर गोपालतापनी उपनिषद् में...