भारतकोश
गोविन्द भाष्य (श्रील बलदेव विद्याभूषण - अचिन्त्यभेदाभेद वेदान्त ब्रह्मसूत्र भाष्य सटीक)

गोविन्द भाष्य (श्रील बलदेव विद्याभूषण - अचिन्त्यभेदाभेद वेदान्त ब्रह्मसूत्र भाष्य सटीक)

Govinda Bhashya of Baladeva Vidyabhushana with Commentary

श्रील बलदेव विद्याभूषण (संपादक: कृष्णदास बाबा जी) द्वारा

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प्रकरण-सन्दभः "परमपुरुष भगवान् इस सम्पूर्ण प्राकृत जगत् में सर्वत्र व्याप्त रूप से उपस्थित हैं।" संशयः संशयः — क्या चिद्व्योम (आध्यात्मिक आकाश/परमव्योम) में वर्णित भगवान् की पुरी (परमधाम/नगर) का वर्णन केवल भगवान् की महिमा का रूपक (अलंकार) मात्र है, अथवा वास्तव में वहाँ अनेक अद्भुत प्रासादों, गोपुर-द्वारों, परकोटों (प्राचीरों) आदि दिव्य वैशिष्ट्यों से युक्त ऐसा वास्तविक नगर विद्यमान है? पूर्वपक्षः पूर्वपक्षः — अत्र किं प्राप्तम्? क्या यह केवल रूपक है? उत्तर यह है कि ये समस्त वर्णन केवल परमेश्वर की असीम महिमा को व्यक्त करने हेतु रूपकात्मक (गौण) हैं। छान्दोग्योपनिषद् (७।२४।१) में कहा गया है — श्रुति-प्रमाणम् (छान्दोग्योपनिषद् ७।२४।१) «स भगवः कस्मिन् प्रतिष्ठित इति। स्वे महिम्नि...» श्रुति-हिन्दी-अनुवादः "हे भगवन्! वह परमात्मा किसमें प्रतिष्ठित (स्थित) हैं? वे अपनी ही महिमा में प्रतिष्ठित हैं।" इस प्रकार श्रुति-शास्त्र भगवान् को स्व-महिमा में ही प्रतिष्ठित बतलाता है। अतः आध्यात्मिक आकाश में वर्णित धाम वास्तव में भगवान् की महिमा ही है, कोई पृथक् देश या नगर नहीं। इसलिए यह सम्भव नहीं कि परमेश्वर का किसी सीमित स्थानविशेष में आवास हो। इसकी पुष्टि "ब्रह्मैव..." इत्यादि श्रुति-वाक्यों से भी होती है। सिद्धान्तः सिद्धान्तः — इस पूर्वपक्ष के निवारणार्थ सूत्रकार भगवान् बादरायण अग्रिम सूत्र प्रस्तुत करते हैं — ब्रह्मसूत्रम् (३।३।३६) सूत्र ३६ «अन्तरा भूतग्रामवत् स्वात्मनः॥ ३६॥» पदच्छेदः एवं शब्दार्थः अन्तरा — अन्तः, मध्ये (भीतर / चिद्व्योम के मध्य में); भूत-ग्राम-वत् — भौतिक-तत्त्व-निर्मित-नगरवत् (भौतिक जगत् के नगर के समान प्रासाद-गोपुरादि-युक्त); स्वात्मनः — स्वस्य, स्वभक्तानाम् (परमात्मा के अपने स्वरूप से / अपने भक्तों के प्रति)। सूत्रार्थः (हिन्दी अनुवाद) चिद्व्योम के भीतर परमधाम अपने भक्तों के लिए भौतिक नगर के सदृश साक्षात् स्वरूप-विभूतियों सहित नित्य विद्यमान है। श्रीमद्-बलदेवविद्याभूषण-कृत गोविन्दभाष्य-तात्पर्यम् गोविन्दभाष्य-भावानुवादः भगवान् के अपने भक्तों के लिए चिद्व्योम में वह परमधाम एक महान् नगर के सदृश नित्य प्रत्यक्ष है। यहाँ "स्वात्मनः" पद का अर्थ "अपने निज भक्त के प्रति" (स्वभक्तस्य) है। श्रुति-शास्त्र (मुण्डकोपनिषद् ३।२।३ एवं कठोपनिषद् १।२।२३) में भी यही स्पष्ट किया गया है —