गोविन्द भाष्य (श्रील बलदेव विद्याभूषण - अचिन्त्यभेदाभेद वेदान्त ब्रह्मसूत्र भाष्य सटीक)
Govinda Bhashya of Baladeva Vidyabhushana with Commentary
श्रील बलदेव विद्याभूषण (संपादक: कृष्णदास बाबा जी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें"ज्ञान का अर्थ है प्रामाणिक सद्गुरु की शरण ग्रहण करना और विशुद्ध होना।" इस प्रकार शास्त्र स्पष्ट करते हैं कि परम पुरुष श्रीभगवान् की प्राप्ति सद्गुरु की कृपा से ही सम्भव होती है। अधिकरण २१ श्रीगुरुकृपा-अधिकरणम् (सद्गुरु की कृपा) श्रील बलदेव विद्याभूषण द्वारा भूमिका संशय: कौन अधिक महत्वपूर्ण है: व्यक्ति का अपना प्रयास अथवा सद्गुरु की कृपा? पूर्वपक्ष: यदि कोई अपनी ओर से यत्न (प्रयास) नहीं करता, तो सद्गुरु की कृपा प्रभावकारी नहीं होगी। अतः व्यक्ति का अपना प्रयास ही अधिक महत्वपूर्ण है। सिद्धान्त: सूत्रकार (श्रीवेदव्यास) निम्नलिखित शब्दों में अपना निष्कर्ष प्रस्तुत करते हैं। सूत्र ४५ लिङ्गभूयस्त्वात् तद्धि बलीयस्तदपि ॥ लिङ्ग — प्रमाणों/लक्षणों के; भूयस्त्वात् — बाहुल्य के कारण; तत् — वह (गुरुकृपा); हि — निश्चय ही; बलीयः — अधिक बलवान्/श्रेष्ठ; तत् — वह; अपि — भी। अनेक प्रमाणों व लक्षणों के बाहुल्य से वह (गुरुकृपा) ही अधिक बलवती है, वह भी। श्रील बलदेव विद्याभूषण कृत भाष्य / तात्पर्य यद्यपि वृषभ तथा अन्य जीवों का रूप धारण करने वाले देवताओं द्वारा पहले ही सत्यकाम को परमतत्त्व का उपदेश प्राप्त हो चुका था, तथापि शिष्य सत्यकाम ने अपने सद्गुरु से ही पुनः प्रार्थना की (छान्दोग्योपनिषद् ४।९।२):