भारतकोश
गोविन्द भाष्य (श्रील बलदेव विद्याभूषण - अचिन्त्यभेदाभेद वेदान्त ब्रह्मसूत्र भाष्य सटीक)

गोविन्द भाष्य (श्रील बलदेव विद्याभूषण - अचिन्त्यभेदाभेद वेदान्त ब्रह्मसूत्र भाष्य सटीक)

Govinda Bhashya of Baladeva Vidyabhushana with Commentary

श्रील बलदेव विद्याभूषण (संपादक: कृष्णदास बाबा जी) द्वारा

DevanagariHindipublished647 पृष्ठ

पृष्ठ 464, कुल 647 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 464

सर्वदेवेश्वरेश्वरः इतरे ब्रह्मरुद्राद्या नावज्ञेयाः कदाचन ॥ हिन्दी अनुवाद: "भगवान् श्रीकृष्ण समस्त देवताओं के भी ईश्वर एवं परम पुरुषोत्तम हैं, वे ही सर्वदा पूज्य हैं। तथापि ब्रह्मा, शिव आदि अन्य देवताओं का भी कभी अनादर नहीं करना चाहिए।" पूर्वपक्ष: यहाँ कोई शङ्का कर सकता है कि—श्रीगुरुदेव की कृपा तथा साधु-सङ्ग दोनों ही परमेश्वर की कृपा से प्राप्त होते हैं। अतः मुक्ति का वास्तविक कारण केवल भगवान् की ही कृपा है। सौभाग्य भी स्वतन्त्र रूप से घटित नहीं होता, वह भी भगवान् की ही कृपा से उत्पन्न होता है। वास्तव में समस्त कार्य भगवान् की कृपा से ही सम्पादित होते हैं, जैसा कि ब्रह्मसूत्र २.३.३९ में प्रतिपादित किया गया है। अतएव यह कहना युक्तिसङ्गत नहीं है कि मुक्ति श्रीगुरुदेव की कृपा से अथवा भगवत्कृपा के अतिरिक्त किसी अन्य साधन से प्राप्त होती है। सिद्धान्त: इस शङ्का का समाधान यह है कि—यद्यपि वे साधन स्वयं परमेश्वर द्वारा ही प्रेरित होते हैं, तथापि श्रीगुरुदेव की कृपा एवं अन्यान्य कारण भी स्वयं मुक्ति के साक्षात् कारण हैं। इसका निरूपण सूत्र २.३.४० से आरम्भ होने वाले अंश में पहले ही किया जा चुका है। सत्य तो यह है कि परमेश्वर अपने भक्तों द्वारा वशीभूत हो जाते हैं और वे उन्हें अपनी कृपा दूसरों पर वितरण करने की पूर्ण शक्ति प्रदान करते हैं। इस प्रकार भक्तगण स्वतन्त्र माध्यम बनकर दूसरों तक भगवान् की कृपा पहुँचाते हैं। जब भक्त किसी पर कृपा करते हैं, तब परमेश्वर भी उस जीव पर कृपा कर देते हैं। इस प्रकार समस्त प्रतीत होने वाले विरोधों एवं विभिन्न शास्त्र-वचनों का यथार्थ समन्वय हो जाता है। पञ्चविंशतितमम् अधिकरणम् (अधिकरण २५) विषय: परम पुरुषोत्तम भगवान् के साथ मुक्त जीवों के विविध सम्बन्ध श्रीमद्-बलदेवविद्याभूषण-कृत भूमिका छान्दोग्योपनिषद् (३.१४.१) में कहा गया है: अथ खलु क्रतुमयः पुरुषो यथाक्रतुरस्मिल्लोके पुरुषो भवति तथेतः प्रेत्य भवति स क्रतुं कुर्वीत ॥ हिन्दी अनुवाद: "निश्चय ही यह पुरुष (जीवात्मा) सङ्कल्पमय (क्रतुमय) है। इस मनुष्य-लोक में जीवात्मा जैसा सङ्कल्प अथवा चिन्तन करता है, इस देह का त्याग कर परलोक में वह वैसा ही बन जाता है; अतः उसे सद्-सङ्कल्प (उपासना) करना चाहिए।"