भारतकोश
गोविन्द भाष्य (श्रील बलदेव विद्याभूषण - अचिन्त्यभेदाभेद वेदान्त ब्रह्मसूत्र भाष्य सटीक)

गोविन्द भाष्य (श्रील बलदेव विद्याभूषण - अचिन्त्यभेदाभेद वेदान्त ब्रह्मसूत्र भाष्य सटीक)

Govinda Bhashya of Baladeva Vidyabhushana with Commentary

श्रील बलदेव विद्याभूषण (संपादक: कृष्णदास बाबा जी) द्वारा

DevanagariHindipublished647 पृष्ठ

पृष्ठ 468, कुल 647 में से

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श्रुति-वचन (मुण्डक उपनिषद् ३.२.३): "नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन। यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम्॥" हिन्दी अनुवाद: "यह परमात्मा न तो व्याख्यानों से प्राप्त होता है, न विशाल बुद्धि से और न बहुत सुनने से ही। वह केवल उसी के द्वारा प्राप्त होता है जिसका वह स्वयं वरण करता है; उसके सम्मुख यह परमात्मा अपने स्वरूप को प्रकट कर देता है।" संशय: क्या भगवान् केवल अपनी स्वेच्छा (वरण) से ही प्रकट होते हैं, अथवा किसी साधक की अनन्य भक्ति और भौतिक वैराग्य के कारण प्रकट होते हैं? पूर्वपक्ष: भगवान् केवल इसलिए प्रकट होते हैं क्योंकि वे अपनी इच्छा से चुनते हैं, क्योंकि शास्त्र ऐसा ही प्रतिपादित करता है। सिद्धान्त: इस संशय के निवारणार्थ सूत्रकार अपना सिद्धान्त प्रस्तुत करते हैं— ब्रह्मसूत्र (वेदान्त-सूत्र) ३.३.५४ परेण च शब्दस्य ताद्विध्यं भूयस्त्वात्त्वनुबन्धः ॥ ५४ ॥ पदच्छेद एवं शब्दार्थ: परेण — परवर्ती (उत्तर) श्रुति-वचन के द्वारा; — भी; शब्दस्य — श्रुति-शब्द का; ताद्विध्यम् — वैसा ही भाव/अर्थ (तथाविधत्व); भूयस्त्वात् — बाहुल्य/प्राधान्य होने से; तु — वास्तव में; अनुबन्धः — सम्बन्ध (साधन का अनुषङ्ग)। सूत्रार्थ: परवर्ती वचन से भी शब्द का वही अर्थ सिद्ध होता है। भक्ति की अधिकता एवं प्राधान्य होने के कारण ही भगवान् का यह वरण-सम्बन्ध घटित होता है। श्रील बलदेव विद्याभूषण विरचित गोविन्दभाष्य (तात्पर्य): यहाँ यह जो कहा गया है कि 'जिसका वे वरण करते हैं, उसी को प्राप्त होते हैं'—यह कथन वस्तुतः इस तथ्य के अभिन्न है कि 'भगवान् भक्ति-साधना द्वारा ही प्राप्त होते हैं।' यह तथ्य इस वचन के ठीक पश्चात् आने वाले मन्त्र से पूर्णतः स्पष्ट हो जाता है। अतः इसका यह अर्थ नहीं है कि बिना किसी साधन के भगवान् स्वेच्छाचार से प्रकट होते हैं। इसके अनन्तर पठित मन्त्र इस प्रकार है (मुण्डक उपनिषद् ३.२.४): श्रुति-मन्त्र: नायमात्मा बलहीनेन लभ्यो न च प्रमादात्तपसो वाप्यलिङ्गात्। एतैरुपायैर्यतते यस्तु विद्वां- स्तस्यैष आत्मा विशते ब्रह्मधाम॥ मन्त्रार्थ: "यह परमात्मा आध्यात्मिक बल (भक्ति-बल) से हीन पुरुष द्वारा प्राप्त नहीं किया जा सकता; न ही प्रमादी (असावधान) व्यक्ति द्वारा अथवा अनुचित (संन्यास-रहित) तपस्या से प्राप्त किया जा सकता है। किन्तु जो विद्वान् इन यथार्थ उपायों द्वारा प्रयत्न करता है, उसका यह आत्मा ब्रह्म-धाम में प्रवेश कर जाता है।"

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