भारतकोश
गोविन्द भाष्य (श्रील बलदेव विद्याभूषण - अचिन्त्यभेदाभेद वेदान्त ब्रह्मसूत्र भाष्य सटीक)

गोविन्द भाष्य (श्रील बलदेव विद्याभूषण - अचिन्त्यभेदाभेद वेदान्त ब्रह्मसूत्र भाष्य सटीक)

Govinda Bhashya of Baladeva Vidyabhushana with Commentary

श्रील बलदेव विद्याभूषण (संपादक: कृष्णदास बाबा जी) द्वारा

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उनके रूपों का नानात्व सर्वदा विद्यमान और मुख्य महत्त्व रखता है। इसका प्रमाण इस सूत्र में "तथा हि दर्शयति" (क्योंकि श्रुति ऐसा ही दर्शाती है) इन शब्दों में दिया गया है। छान्दोग्योपनिषद् (७.२३.१) में कहा गया है: भूमैव सुखं नाल्पे सुखमस्ति "परम पुरुषोत्तम भगवान् का आनन्द उनकी प्रचुर विविधता में ही है। उनका आनन्द विविधता के अभाव में नहीं है।" अतः भगवान् का आनन्द तथा अन्य गुण प्रचुर मात्रा में और अत्यधिक विविधता में विद्यमान हैं। उन पर इसी प्रकार ध्यान करना चाहिए। शास्त्र उनके विषय में यही दर्शाते हैं। इस सूत्र में "दर्शयति" शब्द का अर्थ है, "वे प्रत्येक परिस्थिति में यही उपदेश देते हैं"। भगवान् के रूपों के नानात्व को स्वीकार किए बिना, उनकी समस्त लीलाओं को नित्य स्वीकार करना सम्भव नहीं है। अधिकरण ३० भगवान् के विभिन्न रूपों पर विभिन्न ध्यान श्रील बलदेव विद्याभूषण द्वारा प्रस्तावना संशय: क्या भगवान् के इन अनेक रूपों की उपासना केवल एक ही प्रकार से की जाती है अथवा उनकी उपासना के अनेक प्रकार हैं? पूर्वपक्ष: चूंकि उपास्य वस्तु (उपास्य तत्त्व) निश्चित रूप से एक ही है, अतः उनकी उपासना का भी केवल एक ही मार्ग होना चाहिए। सिद्धान्त: अग्रिम शब्दों में सूत्रकार अपना सिद्धान्त प्रस्तुत करते हैं। सूत्र ६० नाना शब्दादिभेदात् ॥ नाना—विविधता (नाना प्रकार); शब्द—शब्द; आदि—आदि के; भेदात्—भेद होने से; भेद के कारण।