भारतकोश
गोविन्द भाष्य (श्रील बलदेव विद्याभूषण - अचिन्त्यभेदाभेद वेदान्त ब्रह्मसूत्र भाष्य सटीक)

गोविन्द भाष्य (श्रील बलदेव विद्याभूषण - अचिन्त्यभेदाभेद वेदान्त ब्रह्मसूत्र भाष्य सटीक)

Govinda Bhashya of Baladeva Vidyabhushana with Commentary

श्रील बलदेव विद्याभूषण (संपादक: कृष्णदास बाबा जी) द्वारा

DevanagariHindipublished647 पृष्ठ

पृष्ठ 49, कुल 647 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 49

॥ श्रीब्रह्मसूत्रम् — आनन्दमयाधिकरणम् ॥ पूर्वप्रसङ्गः (सूत्र १६ शेष — श्रीगोविन्दभाष्यम्): तैत्तिरीयोपनिषदि (२।१।१) "सोऽश्नुते सर्वान् कामान् सह ब्रह्मणा विपश्चिता" इत्यत्र मुक्तजीवस्य परब्रह्मणा सहभावश्रवणात् तयोर्भेदः स्पष्टः। 'विपश्चित्' शब्दस्य व्युत्पत्तिः—विविधं पश्यतीति विपश्चित्; पाणिनिसूत्रेण "पृषोदरादीनि यथोपदिष्टम्" (६।३।१०९) इति रूपसिद्धिः। अनेन विविधदिव्यानन्दानुभवचतुरेण परब्रह्मणा सह मुक्तजीवः स्वकामान् समश्नुते। 'अश्नुते' इति पदे 'अश भोजने' इत्यस्मात् धातोः परस्मैपदित्वेऽपि "व्यत्ययो बहुलम्" (पाणिनि ३।१।८५) इति छान्दसादात्मनेपदप्रयोगः। परब्रह्म परमेश्वरः स्वतः परमभोक्ता, जीवश्च तदधीनभोक्ता; तथापि भगवान् स्वभक्तानां माहात्म्यं ख्यापयन् आह— स्मृति-प्रमाणम् (श्रीमद्भागवतम् ९।४।६३): वशे कुर्वन्ति मां भक्ताः सत्स्त्रियः सत्पतिं यथा ॥ (यथा साध्व्यः स्त्रियः स्वपतिं वशीकुर्वन्ति, तथा अनन्यभक्ता मां वशीकुर्वन्ति।) ॥ सूत्रम् १७ ॥ भेदव्यपदेशाच्च ॥ १।१।१७ ॥ पदच्छेदः — भेद-व्यपदेशात्, च। अन्वयः — (जीवात् ब्रह्मणः) भेदव्यपदेशात् च (अयमानन्दमयो न जीवः, अपि तु परं ब्रह्मैव)। पदविभागार्थः — भेद (जीव-ब्रह्मणोः भेदस्य), व्यपदेशात् (श्रुतिषु प्रतिपादनात्, कथनात्), च (अपि च)। सूत्रार्थः — श्रुतौ जीव-ब्रह्मणोः परस्परं भेदकथनाद् अपि आनन्दमयः जीवो न भवति, किन्तु ब्रह्मैव। श्रील-बलदेवविद्याभूषण-विरचितं श्रीगोविन्दभाष्यम्: तैत्तिरीयोपनिषदि (२।७।१) श्रूयते — "रसो वै सः। रसं ह्येवायं लब्ध्वानन्दी भवति ॥" इति। पूर्वपक्षः — विकारप्रवाहे पठितत्वात् आनन्दप्रचुरः संसारी जीव एव आनन्दमयपदेन ग्राह्यः। सिद्धान्तः — नायं जीवः, कुतः? भेदव्यपदेशात्। अत्र लब्धव्यस्य रसस्वरूपस्य ब्रह्मणः, लब्धुश्च जीवस्य भेदः स्पष्टतया व्यपदिश्यते। भाष्य-विवरणम् — 'अयम्' इति प्रत्यगात्मा जीवः, 'रसो वै सः' इति तु परमात्मा ब्रह्म; अतः प्राप्य-प्रापकयोः लब्धव्य-लब्ध्रोश्च भेदात् आनन्दमयो ब्रह्मैव। हिन्दी-अनुवादः: तैत्तिरीय श्रुति के वचन "सह ब्रह्मणा विपश्चिता" में मुक्त आत्मा और परब्रह्म के मध्य का भेद वर्णित है। 'विपश्चित्' का अर्थ है जो विविध वस्तुओं का साक्षात् दर्शन करता है (पृषोदरादि गण से व्युत्पन्न)। इस प्रकार मुक्त आत्मा विविध दिव्य आनन्द के भोक्ता भगवान् का सान्निध्य प्राप्त कर अपनी सभी इच्छाओं को पूर्ण करता है। 'अश्नुते' पद में 'अश भोजने' धातु से उपभोग अर्थ है; छान्दस नियम "व्यत्ययो बहुलम्" से यहाँ आत्मनेपद हुआ है। यद्यपि भगवान् स्वतः परम भोक्ता हैं, फिर भी वे भक्तों के वशीभूत होकर कहते हैं: "जैसे पतिव्रता स्त्री अपने पति को वश में करती है, वैसे भक्त मुझे वश में कर लेते हैं।" सूत्र १७ हिन्दी-भावार्थ: "भेदव्यपदेशाच्च" — वेद में जीव और ईश्वर का भेद स्पष्ट रूप से बतलाए जाने के कारण आनन्दमय जीव नहीं, बल्कि परब्रह्म है। उपनिषद्-प्रमाण (तैत्तिरीय २।७।१): "वह परमात्मा ही रस-स्वरूप है; यह जीव उस रस को पाकर ही आनन्दित होता है।" निष्कर्ष: प्राप्त करने योग्य रस (ब्रह्म) और उसे पाकर आनन्दित होने वाला (जीव) दोनों में भेद होने से आनन्दमय परब्रह्म ही सिद्ध होता है।