गोविन्द भाष्य (श्रील बलदेव विद्याभूषण - अचिन्त्यभेदाभेद वेदान्त ब्रह्मसूत्र भाष्य सटीक)
Govinda Bhashya of Baladeva Vidyabhushana with Commentary
श्रील बलदेव विद्याभूषण (संपादक: कृष्णदास बाबा जी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रुति-शास्त्र द्वारा प्रतिपादित वैदिक कर्मों के वर्णन का वास्तविक प्रयोजन: ॥ ब्रह्मसूत्रम् — सूत्र १४ ॥ स्तुतयेऽनुमतिर्वा ॥ १४ ॥ पदच्छेद एवं शब्दार्थ: स्तुतये — स्तुति के लिए; अनुमतिः — अनुमति (अनुज्ञा); वा — अथवा (अवधारणार्थक / निश्चय के लिए)। सूत्रार्थ: अथवा, (कर्मानुष्ठान की) अनुमति विद्या की स्तुति के लिए है। श्रील बलदेव विद्याभूषण विरचित तात्पर्य (गोविन्दभाष्य): यहाँ 'वा' (अथवा) शब्द अवधारण (निश्चय / बल देने) के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। ईशोपनिषद् (मन्त्र २) में जो यह अनुमति दी गई है कि मनुष्य जीवन-पर्यन्त वैदिक कर्मों का अनुष्ठान कर सकता है, वह केवल इसलिए दी गई है जिससे कि पराविद्या (दिव्य ज्ञान) की महिमा का गुणगान हो सके। यह श्रुति-वाक्य पराविद्या की स्तुति करता है; क्योंकि जो व्यक्ति तत्त्वज्ञान से सम्पन्न है, वह जीवन भर वैदिक कर्मों को करते हुए भी कर्म-बन्धनों (कर्मफलों) से सर्वथा अलिप्त रहता है। ईशोपनिषद् (मन्त्र २) में कहा गया है: एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति [न कर्म लिप्यते नरे] ॥ "इस प्रकार का कर्म मनुष्य को कर्म-नियम (कर्म-बन्धन) से नहीं बाँधता। मनुष्य के लिए इसके अतिरिक्त अन्य कोई मार्ग नहीं है।" (सिद्धान्त:) इस प्रकार इस पूर्वपक्षीय विचार का पूर्णतया निरसन हो जाता है कि तत्त्वज्ञान वैदिक कर्मकाण्ड का कोई गौण (अधीनस्थ / अङ्गभूत) विषय है। अधिकरण ४ विद्या-माहात्म्य (परम ज्ञान की महिमा) श्रील बलदेव विद्याभूषण द्वारा प्रस्तुत अवतरणिका: अब, जबकि तत्त्वज्ञान की स्वतन्त्रता (पुरुषार्थहेतुत्व) प्रतिपादित कर दी गई है,