गोविन्द भाष्य (श्रील बलदेव विद्याभूषण - अचिन्त्यभेदाभेद वेदान्त ब्रह्मसूत्र भाष्य सटीक)
Govinda Bhashya of Baladeva Vidyabhushana with Commentary
श्रील बलदेव विद्याभूषण (संपादक: कृष्णदास बाबा जी) द्वारा
पृष्ठ 51, कुल 647 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूत्रम्: कामाच्च नानुमानापेक्षा ॥ १८ ॥ पदविभागः एवं शब्दार्थ: कामात् — (परमात्मा की) इच्छा (संकल्प) होने से; च — और; न — नहीं; अनुमान — आनुमानिक (सांख्य-कल्पित प्रधान/प्रकृति) की; अपेक्षा — सम्बन्ध अथवा अपेक्षा। सूत्रार्थ: आनन्दमय पुरुष प्रकृति या सत्त्वगुण का विकार (प्रधान) नहीं हो सकता; क्योंकि प्रधान अचेतन और इच्छारहित है, जबकि आनन्दमय परमेश्वर संकल्प अथवा कामना से युक्त है। श्रील बलदेव विद्याभूषणकृत गोविन्दभाष्य-तात्पर्य: तैत्तिरीयोपनिषद् में कहा गया है — श्रुति-वाक्य: «सोऽकामयत बहु स्यां प्रजायेयेति» हिन्दी अनुवाद: "उस परम पुरुष (आनन्दमय) ने संकल्प (इच्छा) किया — 'मैं बहुत हो जाऊँ, मैं विविध रूपों में उत्पन्न होऊँ'।" इस प्रकार श्रुति-शास्त्र यह प्रतिपादित करता है कि इस विश्व-ब्रह्माण्ड की सृष्टि आनन्दमय परम पुरुष की इच्छा से हुई है। चूंकि वह आनन्दमय पुरुष इस प्रकार संकल्प-इच्छा से पूर्ण है, अतः जड़, अचेतन तथा इच्छारहित 'प्रधान' (प्रकृति का सत्त्वगुण) वह आनन्दमय पुरुष कदापि नहीं हो सकता। सूत्र १९: अस्मिन्नस्य च तद्योगं शास्ति ॥ १९ ॥ पदविभागः एवं शब्दार्थ: अस्मिन् — इस आनन्दमय पुरुष (परमात्मा) में; अस्य — इस (जीवात्मा) का; च — भी; तत्-योगम् — उस (अभय/आनन्द) के सम्बन्ध (योग) को; शास्ति — श्रुति-शास्त्र उपदेश देता है। सूत्रार्थ एवं व्याख्या: आनन्दमय पुरुष प्रधान अथवा प्रकृति से सम्भूत नहीं हो सकता; क्योंकि श्रुति-शास्त्र यह उपदेश करता है कि इस आनन्दमय परमात्मा के साथ सम्बद्ध (युक्त) होने पर ही जीवात्मा को अभय (और आनन्द) की प्राप्ति होती है।