भारतकोश
गोविन्द भाष्य (श्रील बलदेव विद्याभूषण - अचिन्त्यभेदाभेद वेदान्त ब्रह्मसूत्र भाष्य सटीक)

गोविन्द भाष्य (श्रील बलदेव विद्याभूषण - अचिन्त्यभेदाभेद वेदान्त ब्रह्मसूत्र भाष्य सटीक)

Govinda Bhashya of Baladeva Vidyabhushana with Commentary

श्रील बलदेव विद्याभूषण (संपादक: कृष्णदास बाबा जी) द्वारा

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॥ ब्रह्मसूत्रम् ॥ तृतीयाध्याये चतुर्थः पादः (सर्वान्नानुमत्यधिकरणम्) सूत्रम् ३१ शब्दश्चातोऽकामकारे ॥ ३१ ॥ पदच्छेदः — शब्दः, च, अतः, अकामकारे। सूत्रार्थः — अतः (इस कारण से) अकामकारे (स्वेच्छाचार न होने में) शब्दः च (श्रुति-वचन भी प्रमाण है)। श्रील बलदेवविद्याभूषण-कृतं गोविन्दभाष्यम् — आपत्काले हि प्राणरक्षार्थं सर्वान्नानुमतिर्भवति, न त्वनापदि। अनापत्काले तु तत्त्वविदुषा स्वेच्छया शास्त्रमर्यादा न लङ्घनीया। अस्मिन्नर्थे छान्दोग्योपनिषदि (७।२६।२) श्रूयते — "आहारशुद्धौ सत्त्वशुद्धिः सत्त्वशुद्धौ ध्रुवा स्मृतिः। स्मृतिलम्भे सर्वग्रन्थीनां विप्रमोक्षः॥" इति। भाष्यानुवादः (हिन्दी) — इस प्रकार आपातकाल में ही प्राण-रक्षा हेतु सर्वान्न-भक्षण की अनुमति प्राप्त होती है; किन्तु सामान्य काल में दिव्य ज्ञान में स्थित पुरुष अपनी स्वेच्छा से शास्त्र के आदेशों का उल्लंघन नहीं कर सकता। छान्दोग्योपनिषद् (७।२६।२) में कहा गया है — "पवित्र एवं शुद्ध आहार ग्रहण करने से अन्तःकरण की शुद्धि होती है; अन्तःकरण शुद्ध होने पर स्मृति अचल एवं दृढ़ होती है; और निश्चल स्मृति प्राप्त होने पर साधक के हृदय की समस्त अविद्या-ग्रन्थियाँ पूर्णतया विदीर्ण हो जाती हैं।" इस प्रकार छान्दोग्योपनिषद् अपनी इच्छानुसार मनमाना आचरण करने का निषेध करती है। अतएव यद्यपि संकटकाल में किसी भी प्रकार का अन्न ग्रहण करने की छूट है, तथापि सामान्य काल में शास्त्र-प्रदत्त विधि-निषेधों का पालन अनिवार्य है। ॥ इति सर्वान्नानुमत्यधिकरणम् ॥ अथ सप्तममधिकरणम् — स्वनिष्ठाधिकरणम् (स्वनिष्ठ-भक्त एवं वर्णाश्रम-धर्म-विचारः) श्रील बलदेवविद्याभूषण-कृत-अवतरणिका — अथ स्वनिष्ठानां भगवद्भक्तानां वर्णाश्रमधर्मानुष्ठानं विचार्यते। (अब स्वनिष्ठ भक्तों के वर्णाश्रम-धर्म के अनुष्ठान के औचित्य का विचार किया जाता है।)